मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ मुहूर्त्तचिन्तामणि किये गये हैं । मुहूर्त्तचिन्तामणि के दो अर्थ हैं । पहिला यह कि दिन और रात्रि के पन्द्रहवें भाग को और किसी कार्य को करने के लिए विचारे हुए शुभाशुभ काल को मुहूर्त्त कहते हैं । उसके शुभाशुभत्व के विचारने के लिए जितने ग्रन्थ हैं उन सबों में श्रेष्ठ । दूसरा अर्थ यह है कि वाञ्छित फल देनेवाले मणि के सदृश वाञ्छित मुहूर्त्तों का ज्ञांन करानेवाला ग्रन्थ ॥ २ ॥ तिथीशा वह्निकौ गौरी गणेशोऽहिर्गुहो रविः । शिवो दुर्गान्तको विश्वे हरिः कामः शिवः शशी ॥ ३ ॥ अन्वयः—वह्निः, कः, गौरी, गणेशः, अहिः, गुहः, रविः, शिवः, दुर्गा, अन्तकः, विश्वे, हरिः, कामः, शिवः, शशी, (एते) तिथीशाः (ज्ञेयाः) ॥ ३ ॥ अग्नि, ब्रह्मा, पार्वती, गणेश, सर्प, कार्त्तिकेय, सूर्य, शिव, दुर्गा, यम, विश्वेदेव, हरि, कामदेव, शिव और चन्द्रमा ये देवता क्रम से प्रतिपदादि पन्द्रह तिथियों के स्वामी हैं, अर्थात् प्रतिपदा के अग्नि, द्वितीया के ब्रह्मा, तृतीया के पार्वती, चतुर्थी के गणेश, पंचमी के सर्प, षष्ठी के कार्त्तिकेय, सप्तमी के सूर्य, अष्टमी के शिव, नवमी के दुर्गा, दशमी के यम, एकादशी के विश्वेदेव, द्वादशी के हरि, त्रयोदशी के कामदेव, चतुर्दशी के शिव, पूर्णमासी के चन्द्रमा और अमावस के पितर स्वामी हैं । जिन तिथियों के जो स्वामी हैं, उन देवताओं की पूजा वा प्रतिष्ठा आदि उन्हीं तिथियों में करने से शुभदायक होते हैं ॥ ३ ॥ तिथीशचक्र
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| अग्नि | ब्रह्मा | पार्वती | गणेशजी | सर्प | कार्त्तिकेय | सूर्य | शिव | दुर्गा | यम | विश्वेदेव | हरि | काम | शिव | चन्द्र | पितर |
| तिथियों की नन्दादि संज्ञा और उनका शुभाशुभत्व | |||||||||||||||
| नन्दा च भद्रा च जया च रिक्ता पूर्णेति तिथ्योऽशुभमध्यशस्ताः । | |||||||||||||||
| सितेऽसिते शस्तसमाधमाः स्युः सितज्ञभौमार्कगुरौ च सिद्धाः ॥ ४ ॥ | |||||||||||||||
| अन्वयः—सिते (शुक्ले) नन्दा च भद्रा च जया च रिक्ता पूर्णा इति तिथ्यः | |||||||||||||||
| अशुभमध्यशस्ताः (ज्ञेयाः) । असिते (कृष्णपक्षे) शस्तसमाधमाः स्युः । च (पुनः) | |||||||||||||||
| सितज्ञभौमार्कगुरौ (क्रमेण) सिद्धाः (सिद्धयोगाः स्युः) ॥ ४ ॥ |