भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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विवाहप्रकरण १०७ और संवत्सर बदलने के बाद वैशाख में उसी कुल में किसी का मुण्डन या यज्ञोपवीत हो तो वह शुभ है। ऐसे ही उक्त संपूर्ण विषयों में जानना चाहिए ॥ १८ ॥ दुष्ट नक्षत्रों में उत्पन्न वर-कन्या का फल श्वश्रूविनाशमहिजौ सुतरां विधत्तः कन्यासुतौ निर्ऋतिजौ श्वशुरं हतश्च । ज्येष्ठाभजाततनया स्वधवाग्रजं च शक्राग्निजा भवति देवरनाशकर्त्री ॥१९॥ द्वीशाद्यपादत्रयजा कन्या देवरसौख्यदा । मूलान्त्यपादसार्पाद्यपादजातौ तयोः शुभौ ॥२०॥ अन्वयः—अहिजौ कन्यासुतौ सुतरां श्वश्रूविनाशं विधत्तः, च निर्ऋतिजौ कन्यासुतौ श्वशुरं हतः, ज्येष्ठाभजाततनया स्वधवाग्रजं (हन्ति), शक्राग्निजा देवरनाशकर्त्री भवति ॥१९॥ द्वीशाद्यपादत्रयजा कन्या देवरसौख्यदा, मूलान्त्यपादसर्पाद्यपादजातौ तयोः (श्वश्रूश्वशुरयोः) शुभौ ॥२०॥ आश्लेषा में उत्पन्न वर वा कन्या सासु का, मूल नक्षत्र में उत्पन्न कन्या वा वर श्वशुर का, ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न कन्या अपने पति के बड़े भाई का और विशाखा में उत्पन्न कन्या अपने पति के छोटे भाई का नाश करती है ॥१९॥ विशाखा के पहिले तीन चरण में उत्पन्न कन्या अपने पति के छोटे भाई को सुख देती है, मूल नक्षत्र के चौथे चरण में उत्पन्न कन्या वा वर श्वसुर को और आश्लेषा नक्षत्र के पहिले चरण में उत्पन्न कन्या वा वर सासु को सुख देते हैं ॥२०॥ अष्टकूट वर्णो वश्यं तथा तारा योनिश्च ग्रहमैत्रकम् । गणमैत्रं भकूटं च नाडी चैते गुणाधिकाः ॥ २१ ॥ अन्वयः—सुगमः ॥ २१ ॥ वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रहमैत्री, गणमैत्री, भकूट और नाड़ी, ये आठ कूट विवाह में अवश्य विचारना चाहिए । इनमें उत्तरोत्तर का एक गुण अधिक है । यथा वर-कन्या की वर्णमैत्री रहते एक गुण, कन्या की जन्मराशि वर की जन्मराशि के वश्य रहते दो गुण, परस्पर तारा शुभ रहते तीन गुण, वर-