भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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१२८ मुहूर्त्तचिन्तामणि सोमवार, बुध, बृहस्पति, शुक्रवार में विवाह शुभ होता है। उत्तराषाढ़ नक्षत्र के चौथे चरण से लेकर श्रवण के चार दण्ड बीते तक अभिजित् नाम नक्षत्र कहा जाता है ॥ ५५ ॥ ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध वेधोऽन्योन्यमसौ विरिञ्च्यभिजितोर्याम्यानुराधक्षंयो- र्विश्वेन्द्रोर्हरिपित्र्ययोर्ग्रहकृतो हस्तोत्तराभाद्रयोः। स्वातीवारुणयोर्भवेन्निर्रऋतिभादित्यस्तथोपान्त्ययोः खेटे तत्र गते तुरीयचरणाद्योर्वा तृतीयद्वयोः ॥ ५६ ॥ अन्वयः—विरिञ्च्यभिजितोः, याम्यानुराधक्षंयोः, विश्वेन्द्रोः, हरिपित्र्ययोः, हस्तोत्तराभाद्रयोः, स्वातीवारुणयोः, निर्रऋतिभादित्ययोः, तथा उपान्त्ययोः ग्रहकृतः वेधः भवेत्। तत्र गते खेटे तुरीयचरणाद्योः वा (तथा) तृतीयद्वयोः वेधः भवेत् ॥ ५६ ॥ पाँच रेखा खड़ी खींचकर उन्हीं के ऊपर पाँच आड़ी रेखा और चारों कोनों में दो-दो तिरछी रेखा खींचे, तब जो आकार बन जाता है, उसे पञ्च- शलाका चक्र कहते हैं। इस चक्र में ऊपर बाईं ओर के कोने में खींची हुई दूसरी रेखा के छोर पर कृत्तिका नक्षत्र स्थापित करके फिर दाहिने क्रम से सब रेखाओं के छोरों पर रोहिणी से लेकर भरणी पर्यन्त सब नक्षत्र स्थापित किये जाते हैं। तब एक रेखा के दोनों छोरों पर जो नक्षत्र रहते हैं उन दोनों का परस्पर वेध होता है। उदाहरण—यथा रोहिणी और अभिजित् का, भरणी और अनुराधा का, उत्तराषाढ़ और मृगशिरा का, श्रवण और मघा का, हस्त और उत्तराभाद्रपद का, स्वाती और शतभिष का, मूल और पुनर्वसु का, उत्तराफाल्गुनी और रेवती का परस्पर वेध होता है। परन्तु यह वेध ग्रहकृत होता है, अर्थात् एक रेखा में स्थित दो नक्षत्रों में से किसी एक में जो ग्रह स्थित हो वह दूसरे को वेधता है। यथा रोहिणी में कोई ग्रह स्थित हो तो वह अभिजित् को वेधता है और अभिजित् में कोई ग्रह स्थित हो तो वह रोहिणी को वेधता है। ऐसा ही वेध सब नक्षत्रों में जानना चाहिये। इसी चक्र में पाद-वेध भी कहते हैं। उसकी रीति यह है कि एक रेखा में स्थित जिन दो नक्षत्रों का परस्पर वेध होता है उनमें से किसी नक्षत्र के चौथे पाद में ग्रह स्थित हो तो वह उसी रेखा में स्थित दूसरे नक्षत्र के पहिले पाद को वेधता है, यदि तीसरे पाद में स्थित हो तो दूसरे पाद को और दूसरे पाद में स्थित हो तो तीसरे पाद को और पहिले