भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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विवाहप्रकरण १२९ पाद में स्थित हो तो चौथे पाद को वेधता है। यथा रोहिणी के पहिले पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के चौथे पाद को और रोहिणी के दूसरे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के तीसरे पाद को और रोहिणी के दूसरे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के तीसरे पाद को और रोहिणी के चौथे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के पहिले पाद को वेधता है। इसी तरह अन्यत्र भी पादवेध जानना चाहिए ॥ ५६ ॥ सप्तशलाका चक्र में ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध शाक्रेज्ये शतभानिले जलशिवे पौष्णार्यमर्क्षे वसु- द्वीशे वैश्वसुधांशुभे हयभगे सार्पानुराधे मिथः । हस्तोपान्तिमभे विधातृविधिभे मूलादिती त्वाष्ट्रभा- जाङ्घ्री याम्यमघे कृशानुहरिभे विद्धे कुभृद्रेखिके ॥ ५७ ॥ अन्वयः -कुभृद्रखिके (सप्तशलाके चक्रे) शाक्रेज्ये, शतभानिले, जलशिवे पौष्णार्य- मर्क्षे, वसुद्वीशे, वैश्वसुधांशुभे, हयभगे, सार्पानुराधे, हस्तोपान्तिमभे, विधातृविधिभे, मूलादिती, त्वाष्ट्रभाजांघ्री, याम्यमघे, कृशानुहरिभे, मिथः विद्धे (स्तः) ॥ ५७ ॥ सात रेखा खड़ी खींचकर उन्हीं के ऊपर सात रेखा आड़ी खींचने से जो आकार बन जाता है उसे सप्तशलाका चक्र कहते हैं। इस सप्तशलाका चक्र में ऊपर बाईं ओर खड़ी रेखा के छोर पर कृत्तिका नक्षत्र को स्थापित करके दाहिने क्रम से सब रेखाओं के छोरों पर रोहिणी आदि भरणीपर्यंत सब नक्षत्र स्थापित किये जाते हैं। तब जो एक रेखा के दोनों छोरों पर दो नक्षत्र रहते हैं उनका परस्पर वेध होता है। यथा ज्येष्ठा और पुष्य का, शतभिष और स्वाती का, पूर्वाषाढ़ और आर्द्रा का, रेवती और उत्तरा- फाल्गुनी का, धनिष्ठा और विशाखा का, उत्तराषाढ़ और मृगशिरा का, अश्विनी और पूर्वाफाल्गुनी का, आश्लेषा और अनुराधा का, हस्त और उत्तराभाद्रपद का, रोहिणी और अभिजित् का, मूल और पुनर्वसु का, चित्रा और पूर्वाभाद्रपद का, भरणी और मघा का कृत्तिका और श्रवण का परस्पर वेध होता है। यह वेध भी ग्रह के द्वारा होता है अर्थात् एक रेखा के दोनों छोरों पर स्थित दो नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह ग्रह उसी रेखा के दूसरे छोर पर स्थित दूसरे नक्षत्र को वेधता है। यथा ज्येष्ठा नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह पुष्य नक्षत्र को वेधता है, अथवा पुष्य ही नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह ज्येष्ठा नक्षत्र को वेधता