मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरण १४३ नवांश के स्वामी का मित्र होकर शुभग्रह यदि लग्न से सातवें भाव के नवांश को या सातवें भाव को देखता हो तो स्त्री को शुभ होता है। ऐसा शास्त्र में कहा और देखा गया है ॥ ७८ ॥ सूर्य-संक्रान्ति में निषिद्धकाल विषुवायनेषु परपूर्वमध्यमान् दिवसांस्त्यजेदितरसंक्रमेषु हि । घटिकास्तु षोडशशुभक्रियाविधौ परतोपि पूर्वमपि सन्त्यजेद्बुधः ॥ ७९ ॥ अन्वयः—विषुवायनेषु [संक्रान्तिषु] (क्रमेण) परपूर्वमध्यमान् दिवसान् त्यजेत् । इतरसंक्रमेषु हि परतः पूर्वं अपि षोडश घटिकाः शुभक्रियाविधौ बुधः त्यजेत् ॥ ७९ ॥ विषुव अर्थात् तुला और मेष, अयन अर्थात् कर्क और मकर की संक्रान्ति जिस दिन हो वह दिन और उससे एक दिन आगे और पीछे, इन तीन दिनों में विवाहादि शुभ कार्य न करे। अन्य संक्रान्तियों में जिस समय संक्रान्ति हो उससे पहिले सोलह दण्ड और पीछे सोलह दण्ड त्याग दे अर्थात् इन बत्तीस दण्डों में विवाहादि शुभ कार्य न करे ॥ ७९ ॥ सूर्यादि ग्रहों की संक्रान्तियों में निषिद्धकाल देवद्वचङ्कर्तवोऽष्टाष्टौ नाड्योऽङ्काः खनृपाः क्रमात् । वर्ज्याः संक्रमणेऽर्कादेः प्रायोऽर्कस्यातिनिन्दिताः ॥ ८० ॥ अन्वयः—अर्कादेः संक्रमणे क्रमात् देवद्वयंकर्तवः अष्टाष्टौ अंकाः खनृपाः नाड्यः वर्ज्याः । अर्कस्य प्रायः अतिनिन्दिताः (भवन्ति) ॥ ८० ॥ संक्रान्ति* काल से पूर्व और पर मिलाकर तेंतिस दण्ड सूर्य की संक्रान्ति में, तो दण्ड चन्द्रमा की संक्रान्ति में, नवदण्ड मंगल की संक्रान्ति में, छः दण्ड बुध की संक्रान्ति में, अठ्ठासी दण्ड बृहस्पति की संक्रान्ति में, नव दण्ड शुक्र की संक्रान्ति में और एक सौ साठ दण्ड शनैश्चर की संक्रान्ति में निषिद्ध होते हैं, इसलिए विवाहादि शुभ कार्यों में त्यागने के योग्य हैं। किन्तु इनमें सूर्य की संक्रान्तिवाले तेंतिस दण्ड अति अशुभ होते हैं ॥ ८० ॥ पंगु-अन्धादि लग्नदोष घस्रे तुलाली बधिरौ मृगाश्वौ रात्रौ च सिंहाजवृषा दिवान्धाः । कन्यातृयुक्कर्कटका निशान्धा दिने घटोऽन्त्यो निशि पङ्गुसंज्ञः ॥ ८१ ॥ अन्वयः—घस्रे [दिने] तुलाली बधिरौ [भवेताम्], रात्रौ मृगाश्वौ बधिरौ *एक राशि से दूसरी राशि में ग्रहों के जाने को संक्रान्ति कहते हैं ।