मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरण १४७ में या नीच स्थान में स्थित हो अथवा अस्त हो, तो लग्न से आठवें स्थान में रहकर भी दोषकारक नहीं होता। यदि चन्द्रमा अपने नीच स्थान में या नीच राशि के नवांश में स्थित हो तो लग्न से बारहवें, आठवें, छठे स्थान में रहने का दोष नहीं होता ॥ ८८ ॥ वर्ष आदि अनेक दोषों का परिहार अब्दायनर्तुतिथिमासभपक्षदग्धतिथ्यन्धकाणबधिराऽङ्गमुखाश्च दोषाः । नश्यन्ति विद्गुरुसितेष्विह केन्द्रकोणे तद्वच्च पापविधयुक्तनवांशदोषः ॥ ८९ ॥ अन्वयः—विद्गुरुसितेषु केन्द्रकोणे (स्थितेषु) इह अब्दायनर्तुतिथिमासभपक्षदग्ध- तिथ्यन्धकाणबधिरांगमुखाः दोषाः नश्यन्ति च पुनः तद्वत् पापविधयुक्तनवांशदोषः नश्यति ॥ ८६ ॥ लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें, दशवें स्थान में बुध, बृहस्पति और शुक्र के रहते सम-विषमादि वर्षदोष, अयनदोष, ऋतुदोष, रिक्तादि तिथिदोष, मास- दोष, क्रूरग्रहसहितादि नक्षत्रदोष, तेरह दिन का पक्षदोष, दग्धातिथिदोष अन्ध-काण-बधिरादि लग्नदोष और अकालवृष्टि आदि दोष नष्ट हो जाते हैं। ऐसे ही चन्द्रयुक्त राशि के नवांश में पापग्रह के रहने का भी दोष नष्ट हो जाता है ॥ ८९ ॥ अन्य दोषों का परिहार केन्द्रे कोणे जीव आये रवौ वा लग्ने चन्द्रे वापि वर्गोत्तमे वा । सर्वे दोषा नाशमायान्ति चन्द्रे लाभे तद्वद्दुर्मुहूतांशदोषाः ॥ ९० ॥ अन्वयः—जीवे केन्द्रे वा कोणे, वा रवौ आये, वा लग्ने वर्गोत्तमे, अपि वा चन्द्रे वर्गोत्तमे [स्थिते] सर्वे दोषाः नाशं आयान्ति, तद्वत् चन्द्रे लाभे (सति) दुर्मुहूर्तांशदोषाः नाशं आयान्ति ॥ ९० ॥ लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें, दशवें स्थान में बृहस्पति, लग्न से गेरहवें स्थान में सूर्य तथा लग्न के वर्गोत्तम में या अपने वर्गोत्तम में चन्द्रमा के रहते सब दोष नष्ट हो जाते हैं । ऐसे ही लग्न से गेरहवें स्थान में चन्द्रमा के रहते दुष्टमुहूर्त्तदोष तथा पापग्रह के नवांश का दोष नष्ट हो जाता है ॥ ९० ॥ सामान्य दोषों का परिहार त्रिकोणे केन्द्रे वा मदनरहिते दोषशतकं हरेत्सौम्यः शुक्नो द्विगुणमपि लक्षं सुरगुरुः ।