मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ मुहूर्तचिन्तामणि भवेदाये केन्द्रेऽङ्गप उत लवेशो यदि तदा समूहं दोषाणां दहन इव तूलं शमयति ॥ ९१ ॥ अन्वयः—सौम्यः त्रिकोणे वा मदनरहिते केन्द्रे (स्थितः) दोषशतकं हरेत् । अपि शुक्रः द्विगुणं, सुरगुरुः लक्षं [लक्षगुणं] दोषं हरेत् । अंगपः उत् लवेशः यदि आये वा केन्द्रे भवेत् तदा दोषाणां समूह दहनः तूलं इव शमयति ॥ ६१ ॥ यदि लग्न, चौथे, पाँचवें, नवें या दशवें स्थान में बुध स्थित हो तो सौ दोषों को हरता है। यदि इन्हीं स्थानों में शुक्र स्थित हो तो पूर्व से द्विगुण, अर्थात् दो सौ दोषों को हरता है। यदि इन्हीं स्थानों में बृहस्पति स्थित हो तो एक लाख दोषों को हरता है। लग्न का स्वामी अथवा नवांश का स्वामी यदि लग्न, चौथे, दशवें, गेरहवें स्थान में स्थित हो तो दोषों के समूह को वैसे ही नष्ट करता है जैसे अग्नि रुई के ढेर को भस्म करती है ॥ ९१ ॥ लग्न का विंशोपक बल द्वौ द्वौ ज्ञभृग्वोः पञ्चेन्दौ रवौ सार्द्धत्रयो गुरौ । रामा मन्दागुकेत्वारे सार्द्धैकैकं विंशोपकाः ॥ ९२ ॥ अन्वयः—ज्ञभृग्वोः द्वौ द्वौ, इन्दौ पञ्च, रवौ सार्धत्रयः, गुरौ रामः, मन्दागुकेत्वारे सार्धैकैकं विंशोपकाः (भवन्ति) ॥ ६२ ॥ इसी प्रकरण के सत्तासी श्लोक में कहे हुए अपने शुभ स्थानों में स्थित रहते बुध का दो बिस्वा, शुक्र का दो बिस्वा, चन्द्रमा का पाँच बिस्वा, सूर्य का साढ़े तीन बिस्वा, बृहस्पति का तीन बिस्वा, शनैश्चर का डेढ़ बिस्वा और राहु, केतु तथा मंगल का डेढ़-डेढ़ बिस्वा बल होता है। उक्त स्थानों से अन्यत्र स्थित रहते सूर्य आदि ग्रह शून्यबल होते हैं। प्रयोजन यह है कि विवाहकाल में यह सब बल मिलकर पन्द्रह से बीस बिस्वा तक हो तो लग्न शुभ और दश से पन्द्रह बिस्वा तक हो तो मध्यम और पाँच से दस बिस्वा तक हो तो अशुभ होती है। पाँच बिस्वा से कम हो तो वह लग्न वर्जित होती है ॥ ९२ ॥ इवश्ववादि के सुख-दुःख जानने का उपाय श्वश्रूः सितोऽर्कः श्वशुरस्तनुस्तनुर्जामित्रपः स्याद्दयितो मनः शशी । एतद्बलं संप्रतिभाव्य तान्त्रिकस्तेषां सुखं संप्रवदेद्विवाह्रतः ॥ ९३ ॥