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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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है। अथवा पूर्व देशों में तथा कलिंग देश में गोधूलि मुख्य होती है। अथवा गांधर्वविवाह तथा वैश्य आदि के विवाह में गोधूलि श्रेष्ठ है। अथवा कोई शुभ लग्न न हो और कन्या युवती हो गई हो तो विधवा आदि भारी दोषों को छोड़कर गोधूलि में विवाह श्रेष्ठ होतस है ॥ ९९ ॥ समयभेद से गोधूलिकाल पिण्डीभूते दिनकृति हेमन्ततौ स्यादर्धास्ते तपसमये गोधूलिः । संपूर्णस्ते जलधरमालाकाले त्रेधा योज्या सकलशुभे कार्यादौ ॥ १०० ॥ अन्वयः—हेमन्ततौ दिनकृति (सूर्ये) पिण्डीभूते (सति), तपसमये अर्धास्ते (सति) जलधरमालाकाले सम्पूर्णास्ते [सूर्ये सति] गोधूलिः स्यात्, एवं त्रेधा [गोधूलिः] सकल- शुभकार्यादौ योज्या ॥ १०० ॥ हेमन्त ऋतु से यहाँ प्रयोजन शीतकाल से है, जाड़े के चार महीनों में कुहिरा आदि से ढककर सायंकाल में जब सूर्य भात के गोले के समान स्वच्छ तेजरहित देख पड़े तब, और चैत्रादि गर्मी के चार महीनों में सूर्य के आधे अस्त हो जाने पर और वर्षाकाल अर्थात् श्रावण आदि चार महीनों में सूर्य के सम्पूर्ण अस्त हो जाने पर गोधूलि होती है। यह गोधूलि का समय संपूर्ण कार्यों में शुभ होता है। गोधूलिपद का अर्थ यह है कि जब सायं काल में इकट्ठी होकर वन से घर की ओर आती हुई गौओं के खुरों से उठी हुई धूलि से आकाश भर जाता है, उस समय का नाम गोधूलि काल है ॥ १०० ॥ गोधूलि समय में त्याज्य दोष अस्तं यात गुरुदिवसे सौरे सार्के लग्नान्मृत्यो रिपुभवने लग्ने चेन्दौ । कन्यानाशस्तनुमदमृत्युस्थे भौमे वोढुर्लाभे धनसहजे चन्द्रे सौख्यम् ॥ १०१ ॥ अन्वयः—गुरुदिवसे अस्तं याते (सूर्ये), सौरे सार्के गोधूलिः भवति लग्नात् मृत्यौ रिपुभवने, च लग्ने इन्दौ कन्यानाशः स्यात् तथा तनुमदमृत्युस्थे भौमे वोढुः मृत्युः स्यात्, लाभे धनसहजे चन्द्रे (सति) सौख्यं भवेत् ॥ १०१ ॥ बृहस्पति के दिन सूर्यास्त होने के बाद और शनैश्चर के दिन सूर्यास्त होने के पूर्व गोधूलि शुभ होती है। बृहस्पति के दिन सूर्यास्त से पूर्व अर्द्धयाम दोष और शनैश्चर के दिन सूर्यास्त के बाद कुलिक दोष रहता है, इसलिए इन दोनों कालों की गोधूलि निषिद्धि होती है। लग्न से आठवें या छठे स्थान में अथवा लग्न में चन्द्रमा के स्थित रहते कन्या की

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