भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

१६० मुहूर्तचिन्तामणि पिता के घर में और पहिले चैत्र मास में पति के घर में रहना चाहिए। जिन महीनों में जहाँ रहने से जिन लोगों को दोष कहा है, उस स्त्री के यदि वे लोग जीवित न हों तो उन महीनों में वहाँ रहने का कोई दोष नहीं है ॥ ३ ॥

द्विरागमनप्रकरण -:०:- चरेदथौजहायने घटालिमेषगे रवौ रवीज्यशुद्धियोगतः शुभग्रहस्य वासरे । नृयुग्ममीनकन्यकातुलावृषे विलग्नके द्विरागमं लघुध्रुवे चरेऽस्रपे मृदूडुभिः ॥ १ ॥ अन्वयः—अथ (वधूप्रवेशानन्तरं) ओजहायने घटालिमेषगे रवौ, रवीज्यशुद्धि- योगतः शुभग्रहस्य वासरे नृयुग्ममीनकन्यकातुलावृषे विलग्नके लघुध्रुवे चरे अस्रपे मृदूडुभिः द्विरागमं चरेत् ॥ १ ॥ विवाह के दिन से पहिले, तीसरे, पाँचवें आदि विषम वर्षों में तथा कुम्भ, वृश्चिक, मेष इन राशियों में से किसी में सूर्य के रहते; सूर्य और बृहस्पति के शुद्ध रहते; सोमवार, बुध, बृहस्पति या शुक्रवार में; मिथुन, मीन, कन्या, तुला वा वृष लग्न में तथा अश्विनी, पुष्य, हस्त, रोहिणी, तीनों उत्तरा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, मूल, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा और रेवती नक्षत्र में स्त्री दूसरी बार अपने स्वामी के घर में जाय तो शुभ होता है ॥ १ ॥ सम्मुख और दक्षिण शुक्र का दोष दैत्येज्यो ह्यभिमुखदक्षिणे यदि स्याद्गच्छेयुर्नहि शिशुगर्भिणीनवोढाः । बालश्चेद्व्रजति विपद्यते नवोढा चेद्वन्ध्या भवति च गर्भिणी त्वगर्भा ॥ २ ॥ अन्वयः—यदि दैत्येज्यः अभिमुखदक्षिणे स्यात् (तदा) शिशुगर्भिणीनवोढाः न गच्छेयुः । हि चेत् [यदि] बालः व्रजति तदा विपद्यते, नवोढा व्रजति तदा वन्ध्या भवति, च गर्भिणी अगर्भा भवति ॥ २ ॥ यदि शुक्र सामने या दाहिनी ओर पडते हों तो बालकयुक्त, गर्भवती और नववधू स्त्रियाँ दूसरी बार अपने पति के घर को न जायें; क्योंकि सम्मुख या दक्षिण शुक्र के रहते स्वामी के घर जानेवाली बालकयुक्त स्त्री का बालक मर जाता है, गर्भवती का गर्भ नष्ट हो जाता है और नववधू स्त्री का यदि द्विरागमन होता है तो वह वन्ध्या होती है ॥ २ ॥