मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवधूप्रवेशप्रकरणम् १५९ दिनों के बाद पहिले, तीसरे, पाँचवें वर्ष में, और पहिले, तीसरे, पाँचवें, सातवें, नवें, गेरहवें मास में और पाँच वर्ष के ऊपर अपनी इच्छा के अनुसार सम-विषम वर्ष मास दिन का विचार न करके अथवा हो सके तो करके भी गोचर में वर की जन्मराशि से सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति के बली रहते, दुष्ट भद्रा आदि दोषरहित काल में किया हुआ वधूप्रवेश शुभ होता है ॥ १ ॥ वधूप्रवेश का मुहूर्त्त ध्रुवक्षिप्रमृदुश्रोत्रवसुमूलमघानिले । वधूप्रवेशः सन्नष्टो रिक्तारार्के बुधे परैः ॥ २ ॥ अन्वयः—ध्रुवक्षिप्रमृदुश्रोत्रवसुमूलमघानिले वधूप्रवेशः सत्, रिक्तारार्के नेष्टः, परैः बुधे अपि नेष्टः ॥ २ ॥ रोहिणी, तीनों उत्तरा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, श्रवण, धनिष्ठा, मूल, मघा और स्वाती नक्षत्र में किया हुआ वधूप्रवेश शुभ होता है । चौथ, नवमी और चतुर्दशी तिथि में; रविवार और मंगलवार में तथा कुछ आचार्यों के मत से बुध दिन में भी अशुभ होता है ॥ २ ॥ विवाह के बाद प्रथम वर्ष के महीनों में स्वामी के घर में स्त्री के रहने का फल ज्येष्ठे पतिज्येष्ठमथाधिके पतिं हन्त्यादिमे भर्तृगृहे वधूः शुचौ । श्वश्रूं सहस्ये श्वशुरं क्षये तनुं तातं मधौ तातगृहे विवाहतः ॥ ३ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ वधूप्रवेशप्रकरणं समाप्तम् ॥ ७ ॥ अन्वयः—विवाहतः आदिमे ज्येष्ठे भर्तृगृहे स्थिता वधूः पतिज्येष्ठं, अथ आदिमे अधिके [अधिमासे] पतिं तथा आदिमे शुचौ श्वश्रूं आदिमे सहस्ये श्वशुरं, आदिमे क्षये [क्षयमासे] तनुं हन्ति । तथा आदिमे मधौ तातगृहे स्थिता वधूः तातं हन्ति ॥ ३ ॥ विवाह होने के बाद पहिले ज्येष्ठ में यदि स्वामी के घर में स्त्री रहे तो स्वामी के ज्येष्ठ भाई को, पहिले मलमास में स्वामी को, पहिले आषाढ़ में सासु को, पौष मास में ससुर को, पहिले क्षयमास में अपनी देह को और पिता के घर में यदि पहिले चैत्र में रहे तो पिता को नष्ट करती है, अर्थात् विवाह के बाद पहिले ज्येष्ठ, मलमास, आषाढ़, पूस और क्षयमास में स्त्रियों को