भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

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१६२ मुहूर्तचिन्तामणि लग्नशुद्धि नो कर्कनक्रझषकुम्भनवांशलगने नोऽब्जे तनौ रविशशीज्यकुजे त्रिकोणे । केन्द्रक्षषट्त्रिभवगे च परैस्त्रिलाभषट्खस्थितैर्निधनशुद्धियुते विलग्ने ॥ २ ॥ अन्वयः—कर्कनक्रझषकुम्भनवांशलगने (अग्निहोत्रविधिः) नो, अब्जे तनौ नो शुभः । रविशशीज्यकुजे त्रिकोणे केन्द्रक्षषट्त्रिभवगे परैः (बुधशुक्रशनैश्चरैः) तिलाभषट्खस्थितैः निधनशुद्धियुते विलग्ने [सति अग्निहोत्रविधिः शुभः स्यात्] ॥ २ ॥ कर्क, मकर, मीन, कुम्भ लग्न में और इनके नवांशों में तथा लग्न में चन्द्रमा के (किसी के मत से शुक्र के भी) रहते अग्न्याधान नहीं करना चाहिए। पाँचवें, नवें, लग्न, चौथे, सातवें, दशवें और छठे स्थान में सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति और मंगल हों, तीसरे, गेरहवें, छठे और दशवें स्थान में बुध, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु हों, जन्मलग्न से आठवीं को छोड़ अन्य लग्न में, अथवा जिससे आठवें स्थान में कोई ग्रह हो उस लग्न में अग्न्याधान शुभ होता है ॥ २ ॥ अग्न्याधानकालिक लग्नदश से यज्ञकारक योग वापे जीवे तनुस्थे वा मेषे भौमेऽम्बरे द्युने । षट्त्र्यायेऽब्जे रवौ वा स्याज्जाताग्निर्यजति ध्रुवम् ॥ ३ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणावग्न्याधानप्रकरणं समाप्तम् ॥ ९ ॥ अन्वयः—जीवे चापे तनुस्थे, वा भौमे मेषे (तनुस्थे), अम्बरे द्युने, वा अब्जे [चन्द्रे] षट् त्र्याये, वा रवौ षट्त्र्याये तदा जाताग्निः ध्रुवं यजति ॥ ३ ॥ धनु राशि में स्थित बृहस्पति लग्न में हो, अथवा मेष राशि में स्थित मंगल लग्न में हो, अथवा मंगल लग्न से सातवें या दशवें स्थान में हो, अथवा चन्द्रमा लग्न से तीसरे, छठे या गेरहवें स्थान में हो अथवा सूर्य लग्न से तीसरे, छठे या गेरहवें स्थान में हो तो अग्न्याधान करनेवाला निश्चय करके ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करता है ॥ ३ ॥ ——— राजाभिषेकप्रकरण —:०:— राजाभिषेकः शुभ उत्तरायणे गुर्विन्दुशुक्रैरूदितैर्बलान्वितैः । भौमार्कलग्रेशदशेशजन्मपैर्नो चैत्ररिक्तारनिशामलिम्लुचे ॥ १ ॥