मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ मुहूर्त्तचिन्तामणि तीनों उत्तरा, ये बारह नक्षत्र, और परीवा, तीज, पंचमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी, त्रयोदशी, पूर्णमासी, अमावास्या य तिथियाँ और रविवार, सोमवार, शनैश्चर, बृहस्पति ये दिन अकुलसंज्ञक तथा बुधवार यह एक दिन और मूल, शतभिष, आर्द्रा, अभिजित् ये चार नक्षत्र और दशमी, छठि, दुइज ये तिथियाँ कुलाकुलसंज्ञक ॥ १६ ॥ तथा तीनों पूर्वा, अश्विनी, पुष्य, मघा, मृगशिरा, श्रवण, कृत्तिका, विशाखा, ज्येष्ठा, चित्रा, ये बारह नक्षत्र और शुक्र, मंगल ये दो दिन और द्वादशी, अष्टमी, चतुर्दशी, चौथि, ये चार तिथियाँ कुलसंज्ञक हैं । अकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत्रों में यात्रा या युद्ध का प्रारम्भ करनेवाला यायी राजा, और कुलसंज्ञक तिथि, वार नक्षत्रों में युद्ध का प्रारम्भ करनेवाला स्थायी राजा युद्ध में विजयी होता है, और कुलाकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत्रों में युद्ध करनेवाले यायी, स्थायी दोनों राजाओं में सन्धि हो जाती है ॥ १७ ॥ पन्थाराहु का विचार स्युर्द्धर्मे दस्रपुष्योरगवसुजलपद्धीशमैत्राण्यथार्थे याम्याजाङ्घ्रीन्द्रकर्णादितिपतृपवनोडून्यथोभानि कामे । वह्नचाद्राबुध्न्यचित्रानिरृतिविधिभगाख्यानि मोक्षेथरोहि- ण्यार्य्यम्णाप्येन्दुविश्वान्तिमभदिनकरर्क्षाणि पन्थादिराहौ ॥ १८ ॥ अन्वयः—पन्थादिराहौ दस्रपुष्योरगवसुजलपद्धीशमैत्राणि धर्मे स्युः, अथ याम्या- जांघ्रीन्द्रकर्णादितिपतृपवनोडूनि अर्थे स्युः, अथो वह्नयाद्राबुध्न्यचित्रानिरृतिविधि- भगाख्यानि भानि कामे स्युः, अथ रोहिण्यार्यम्णाप्येन्दुविश्वान्तिमभदिनकरर्क्षाणि मोक्षे स्युः ॥ १८ ॥ पाँच खड़ी रेखाओं के ऊपर नौ आड़ी रेखाओं के खींचने से जो बत्तीस कोठों का चक्र होता है उसे पन्थाराहुचक्र कहते हैं । उसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ये चार मार्ग होते हैं । उन चारों में से धर्ममार्ग में अश्विनी, पुष्य, आश्लेषा, धनिष्ठा, शतभिष, विशाखा, अनुराधा, ये सात नक्षत्र; अर्थमार्ग में भरणी, पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा, श्रवण, पुनर्वसु, मघा, स्वाती, ये सात नक्षत्र; काममार्ग में कृत्तिका, आर्द्रा, उत्तराभाद्रपद, चित्रा, मूल, अभिजित्, पूर्वा- फाल्गुनी ये सात नक्षत्र और मोक्षमार्ग में रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, मृगशिरा, उत्तराषाढ़, रेवती, हस्त, ये सात नक्षत्र स्थापन करने से यह पंथादि राहु स्पष्ट होता है ॥ १८ ॥