मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयात्राप्रकरण १७१ सूर्य मृतपक्ष में और चन्द्रमा जीवपक्ष में हो तो यात्रा शुभ होती है, और इससे विपरीत अर्थात् चन्द्रमा मृतपक्ष में और सूर्य जीवपक्ष में हो तो यात्रा विनाश करनेवाली होती है। यदि सूर्य और चन्द्रमा, दोनों जीवपक्ष में हों तो यात्रा अति शुभ होती है, और यदि सूर्य-चन्द्रमा दोनों मृतपक्ष में हों तो यात्रा अति अशुभ होती है। मृतपक्ष से ग्रस्तसंज्ञक नक्षत्र कैसा शुभकर है जैसे मरे हुए से मरनेवाला रोगी अच्छा होता है, और ग्रस्तसंज्ञक नक्षत्र से कर्तरीसंज्ञक कैसा अच्छा है जैसे कि एक दिन में मरनेवाले से दो दिन में मरनेवाला अच्छा होता है। अब राजाओं की यात्रा का विशेष फल कहते हैं। राजा दो प्रकार के होते हैं—एक यायी, दूसरा स्थायी । जो दूसरे राजा के ऊपर चढ़ाई करता है उसे यायी और जो अपने घर में है उसे स्थायी कहते हैं। चन्द्रमा यायी का स्वामी और सूर्य स्थायी का स्वामी है। यदि सूर्य-चन्द्रमा दोनों जीवपक्ष में हों तो यायी-स्थायी दोनों की विजय होती है और यदि चन्द्रमा जीवपक्ष में हो तो यायी राजा की विजय और सूर्य जीवपक्ष में हो तो स्थायी राजा की विजय होती है, और यदि सूर्य-चन्द्रमा दोनों मृतपक्ष में हों तो दोनों की पराजय होती है ।। १५ ।। युद्धयात्रा के उपयोगी कुलाकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत्र स्वात्यन्तकाहिवसुपौष्णकरानुराधा- दित्यध्रुवाणि विषमास्तिथयोऽकुलाः स्युः । सूर्येन्दुमन्दगुरवश्च कुलाकुलाज्ञो मूलाम्बुपेशविधिभं दशषड्द्वितिथयः ।। १६ ।। पूर्वाश्विज्यमघेन्दुकर्णदहनद्वीशेन्द्रचित्रास्तथा शुक्रारौ कुलसंज्ञकाश्च तिथयोऽर्काष्टेन्द्रवेर्देमिताः । यायी स्यादकुले जयी च समरे स्थायी च तद्वत्कुले सन्धिः स्यादुभयोः कुलाकुलगणे भूमीशयोर्युध्यतोः ।। १७ ।। अन्वयः—स्वात्यन्तकाहिवसुपौष्णकरानुराधादित्यध्रुवाणि विषमाः तिथयः सूर्येन्दु- मन्दगुरवश्च अकुलाः स्युः । ज्ञः मूलाम्बुपेशविधिभं, दशषड्द्वितिथयः कुलाकुलाः स्युः । पूर्वाश्विज्यमघेन्दुकर्णदहनद्वीशेन्द्रचित्राः तथा शुक्रारौ अर्काष्टेन्द्रवेर्देमिताः तिथयः कुल- संज्ञकाः स्यु । अकुले समरे यायी जयी स्यात् । तद्वत् कुले स्थायी जयी स्यात् । कुला- कुलगणे, युध्यतोः उभयोः भूमीशयोः सन्धिः स्यात् ।। १६-१७ ।। स्वाती, भरणी, इलेषा, धनिष्ठा, रेवती, हस्त, अनुराधा, पुनर्वसु, रोहिणी,