मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
DevanagariHindipublished207 पृष्ठ
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१८२ मुहूर्तचिन्तामणि कालपाशचक्र
| र० | चं० | मं० | बु० | बृ० | शु० | श० | वार |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ० | वा० | प० | नै० | द० | आ० | पू० | दिशा दिन में काल |
| द० | आ० | पू० | ई० | उ० | वा० | प० | दिशा दिन में पाश |
| द० | आ० | पू० | ई० | उ० | वा० | प० | दिशा रात्रि में काल |
| उ० | वा० | प० | नै० | द० | आ० | पू० | दिशा रात्रि में पाश |
| परिघदण्ड दोष | |||||||
| पूर्वादिषु चतुर्दिक्षु सप्तसप्तानलर्क्षतः । | |||||||
| वायव्याग्नेयदिकसंस्थं पारिघं नैव लङ्घयेत् ॥ ३६ ॥ | |||||||
| अन्वयः-अनलर्क्षतः सप्त सप्त [नक्षत्राणि] पूर्वादिषु चतुर्दिक्षु (ज्ञेयानि) (तत्र) | |||||||
| वायव्याग्नेयदिकसंस्थं पारिघं नैव लंघयेत् ॥ ३६ ॥ | |||||||
| चतुष्कोण चक्र बनाकर उसमें कृत्तिका से लेकर सात सात नक्षत्र चारों | |||||||
| दिशाओं में लिखे, अर्थात् कृत्तिका से श्लेषा तक पूर्व में, मघा से विशाखा | |||||||
| तक दक्षिण में, अनुराधा से श्रवण तक पश्चिम में और धनिष्ठा से भरणी | |||||||
| तक उत्तर में। उसी चक्र में वायव्य कोण से आग्नेय कोण में गई हुई रेखा | |||||||
| का परिघदण्ड नाम है यात्रा में उसका उल्लंघन न करे, अर्थात् उत्तर | |||||||
| और पूर्व दिशा के नक्षत्रों में दक्षिण और पश्चिम की यात्रा तथा दक्षिण | |||||||
| और पश्चिम दिशा के नक्षत्रों में उत्तर और पूर्व दिशा की यात्रा न | |||||||
| करे ॥ ३६ ॥ | |||||||
| परिघदण्ड चक्र | |||||||
| पूर्व | |||||||
| कृ. रो. मृ. आ. पु. पु. श्ले. | |||||||
| उत्तर म. पू. उ. ह. चि. स्वा. वि. दक्षिण | |||||||
| ध. श. पू. उ. रे. अ. भ. परिघदण्ड | |||||||
| अ. अ. मू. पू. उ. श्र. | |||||||
| पश्चिम |