भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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यात्राप्रकरण १८३ आग्नेयादि कोणों की यात्रा तथा परिघदण्ड का अपवाद अग्नेर्दिशं नृप इयात्पुरुहूतदिग्भै- रेवं प्रदक्षिणगता विदिशोऽथ कृत्ये । आवश्यकेऽपि परिघं प्रविलङ्घ्य गच्छे- च्छूलं विहाय यदि दिक्तनशुद्धिरस्ति ॥ ३७॥ अन्वयः—नृपः पुरुहूतदिग्भैः अग्नेः दिशं इयात्, एवं प्रदक्षिणगताः विदिशः (इयात्), अथ आवश्यके कृत्ये शूलं विहाय यदि दिक्तनशुद्धिः अस्ति, तदा परिघं प्रविलंघ्य अपि गच्छेत् ॥ ३७॥ राजा को चाहिए कि पूर्व दिशा के नक्षत्रों में आग्नेय कोण की यात्रा करे, दक्षिण दिशा के नक्षत्रों में नैर्ऋत्य कोण की, पश्चिम दिशा के नक्षत्रों में वायव्य कोण की, और उत्तर दिशा के नक्षत्रों में ईशान कोण की यात्रा करे । यदि कोई अत्यावश्यक कार्य हो तो दिक्शूल और परिघदण्ड का उल्लंघन करके भी यात्रा करे । यदि दिग्लग्न शुद्ध हो, अर्थात् मेषादि चार चार राशियां पूर्वादि चारों दिशाओं की स्वामिनी हैं, इस क्रम से यदि लग्न सम्मुख पड़ती हो और लग्न से आठवें आदि स्थानों में कोई अनिष्ट ग्रह न हो । यथा श्रवण नक्षत्र में पूर्व की यात्रा आवश्यक हो तो मेष या सिंह या धन लग्न में करे ॥ ३७ ॥ परिघदण्ड का अन्य अपवाद तथा केन्द्र आदि स्थानों में वक्रीग्रह का निषेध मैत्रार्कपुष्याश्विनिभैर्निरुक्ता यात्रा शुभा सर्वदिशासु तज्ज्ञैः । वक्रीग्रहः केन्द्रगतोऽस्यवर्गो लग्ने दिनं चास्य गमे निषिद्धम् ॥ ३८ ॥ अन्वयः—मैत्रार्कपुष्याश्विनिभैः सर्वदिशासु तज्ज्ञैः यात्रा शुभा निरुक्ता । वक्री ग्रहः केन्द्रगतः (वा) लग्ने अस्य वर्गः च अस्य दिनं गमे निषिद्धम् ॥ ३८ ॥ अनुराधा, हस्त, पुष्य, अश्विनी इन नक्षत्रों में सब दिशाओं की यात्रा पण्डितों ने शुभ कही है । केन्द्र में और लग्न में स्थित वक्रीग्रह का षड्वर्ग और वक्रीग्रह का दिन, ये सब यात्रा में निषिद्ध हैं ॥ ३८ ॥ अयनशुद्धि सौम्यायने सूर्यविधू तदोत्तरां प्राचीं व्रजेत्तौ यदि दक्षिणायने । प्रत्यग्यमाशां च तयोर्दिवानिशं भिन्नायनत्वेऽथ वधोऽन्यथा भवेत् ॥ ३९ ॥