भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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यात्राप्रकरण १९३ अन्वयः—त्रिदशगुरुः तनुगः, हिमकिरणः मदने, रविः आयगतः, सितशशिजौ कर्म- गतौ, रविसुतभूमिसुतौ सहजे, (तदापि जयः स्यात्) ।। ६७ ।। अथवा यदि बृहस्पति लग्न में, चन्द्रमा सातवें स्थान में, सूर्य गेरहवें स्थान में और शुक्र, बुध ये दोनों दशवें स्थान में, शनैश्चर और मंगल ये दोनों तीसरे स्थान में स्थित हों, ऐसे योग में यात्रा करने से शत्रु राजा के अधीन हो जाते हैं ।। ६७ ।। देवगुरौ वा शशिनि तनुस्थे वासरनाथे रिपुभवनस्थे । पञ्चमगेहे हिमकरपुत्रः कर्मणि सौरिः सुहृदि सितश्च ।। ६८ ।। अन्वयः—देवगुरौ वा शशिनि तनुस्थे, वासरनाथे रिपुभवनस्थे, हिमकरपुत्रः पञ्चम- गेहे, सौरिः कर्मणि, च सितः सुहृदि (तदापि जयः स्यात्) ।। ६८ ।। अथवा बृहस्पति या शुक्र लग्न में, सूर्य छठे स्थान में, बुध पाँचवें स्थान में, शनैश्चर दशवें स्थान में तथा शुक्र चौथे स्थान में हो, ऐसे योग में राजा की यात्रा माता के समान हितकारिणी होती है ।। ६८ ।। हिमकिरणसुतो बली चेत्तनौ त्रिदशपतिगुरुर्हि केन्द्रस्थितः । व्ययगृहसहजारिधर्मस्थितो यदि च भवति निर्बलश्चन्द्रमाः ।। ६९ ।। अन्वयः—चेत् बली हिमकिरणसुतः तनौ, त्रिदशपतिगुरुः केन्द्रस्थितः, च यदि निर्बलः चन्द्रमाः व्ययगृहसहजारि धर्मस्थितो भवति (तदापि जयः स्यात्) ।। ६९ ।। अथवा यदि बली होकर बुध लग्न में और बृहस्पति केन्द्र में स्थित हो और चन्द्रमा निर्बल होकर बारहवें, तीसरे, छठे, नवें इनमें से किसी स्थान में स्थित हो, ऐसे योग में यात्रा करनेवाले राजा की विजय होती है ।। ६९ ।। अशुभखगैरनवाष्टमदस्थैर्हिबुकसहोदरलाभगृहस्थः । कविरिह केन्द्रगगीष्पतिदृष्टो वसुचयलाभकरः खलु योगः ।। ७० ।। अन्वयः—अशुभखगैः अनवाष्टमदस्थैः, कविः हिबुक सहोदरलाभगृहस्थः केन्द्र- गगीष्पतिदृष्टः इह खलु (निश्चयेन) वसुचयलाभकरः योगः स्यात् ।। ७० ।। अथवा यदि नवें, आठवें, सातवें इन स्थानों को छोड़कर अन्य स्थानों में पापग्रह स्थित हों और चौथे, तीसरे, गेरहवें इन स्थानों में स्थित शुक्र को केन्द्रस्थ बृहस्पति देखता हो तो यह योग यात्रा करनेवाले को धनसमूह का लाभ कराता है ।। ७० ।। रिपुलग्नकर्महिबुके शशिजे परिवीक्षिते शुभनभोगमनैः । व्ययलग्नमन्मथगृहेषु जयः परिवर्जितेष्वशुभनामधरैः ।। ७१ ।।