मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्य परिहार अयोगे सुयोगोपि चेत्स्यात्तदानीमयोगं निहत्यैष सिद्धिं तनोति । परे लग्नशुद्धा कुयोगादिनाशं दिनार्द्धोत्तरं विष्टिपूवं च शस्तम् ॥ ४२ ॥ अन्वयः—चेत् अयोगे सुयोगोऽपि स्यात् तदानीं एष (सुयोगः) अयोगं निहत्य सिद्धिं तनोति, परे (आचाय ) लग्नशुद्धया कुयोगादिनाशं (वदन्ति), विष्टिपूवं दिनार्धोत्तरं शस्तं (कथयन्ति) ॥ ४२ ॥ यदि क्रकचादि कोई दुष्टयोग हो और उसी काल में कोई सिद्धादि शुभ योग भी हो तो वह शुभ योग उस क्रकचादि के फल को नष्ट करके कार्य की सिद्धि करता है। कोई आचार्य कहते हैं कि लग्न शुद्ध हो तो उसी से संपूर्ण कुयोगों का नाश होता है। भद्रा आदि मध्याह्न के अनन्तर शुभ होते हैं। भद्रा आदि का परिहार “विष्टिरंगारकश्चैवव्यतीपातश्चवैधृतिः । प्रत्यरं जन्मनक्षत्रं मध्याह्नात्परतः शुभम् ॥” भद्रा, मंगल दिन, व्यतीपात, वैधृति, प्रत्यरितारा, जन्मनक्षत्र ये सब मध्याह्न के अनन्तर शुभ होते हैं ॥ ४२ ॥ भद्राकाल शुक्ले पूर्वार्द्धेऽष्टमीपञ्चदश्योर्भद्रैकादश्यां चतुर्थ्यां परार्द्धे । कृष्णेऽन्त्यार्द्धं स्यात्ततीयादशम्योः पूर्वे भागे सप्तमीशम्भुतिथ्योः ॥ ४३ ॥ अन्वयः—शुक्ले अष्टमी पञ्चदश्योः पूर्वार्धे, (तथा) एकादश्यां चतुर्थ्यां परार्धे भद्रा (भवति) । कृष्णे तृतीयादशम्योः अन्त्यार्धे, सप्तमीशम्भुतिथ्योः पूर्वे भागे भद्रा (भवति) ॥ ४३ ॥ शुक्लपक्ष की अष्टमी और पूर्णमासी के पूर्वार्द्ध में तथा एकादशी और चौथि के उत्तरार्द्ध में भद्रा होती है। कृष्णपक्ष की तीज और दशमी के उत्तरार्द्ध में तथा सप्तमी और चतुर्दशी के पूर्वार्द्ध में भद्रा होती है ॥ ४३ ॥ भद्रा के मुख और पुच्छ का विचार पञ्चद्यद्रिकृताष्टरामरसभूयामादिघटचः शरा विष्टेरास्यमसद्गजेन्दुरसरामाद्रद्यशिवबाणाब्धिषु । यामेष्वन्त्यघटीत्रयं शुभकरं पुच्छं तथा वासरे विष्टिस्तिथ्यपरार्धजा शुभकरी रात्रौ च पूर्वार्धजा ॥ ४४ ॥