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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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शुभाशुभप्रकरण २१ अन्वयः—पञ्चद्वद्यद्रिकृताष्टरामरसभूयामादिघट्यः शराः विष्टेः आस्यं (प्रोक्तं तत्) असत् । गजेन्दुरसरामाद्र्यश्विबाणाब्धिषु यामेषु अन्त्यघटीत्रयं विष्टेः पुच्छं (प्रोक्तं तत्) शुभकरं । तिथ्यपरार्धजा विष्टिः वासरे तथा पूर्वार्धजा विष्टिः रात्रौ शुभकरी (भवति) ॥ ४४ ॥ चौथि, अष्टमी, एकादशी, पूर्णमासी, तीज, सप्तमी, दशमी और चतुर्दशी, इन तिथियों में क्रम से पाँचवें, दूसरे, सातवें, चौथे, आठवें, तीसरे, छठे और पहिले, इन पहरों की पूर्व की पाँच घड़ी भद्रा का मुख है वह अशुभ होता है। और इन्हीं उक्त तिथियों में क्रम से आठवें, पहिले, छठे, तीसरे, सातवें, दूसरे, पाँचवें और चौथे, इन पहरों के अन्त की तीन घड़ी भद्रा की पुच्छ हैं वह शुभ फलदायक होती हैं। तिथि के उत्तरार्द्ध में होनेवाली भद्रा यदि दिन में हो और तिथि के पूर्वार्द्ध में होनेवाली भद्रा यदि रात्रि में हो तो शुभ होती है ॥ ४४ ॥ भद्रा का निवास और फल कुम्भकर्कद्वये मर्त्ये स्वर्गेऽब्जेऽजातत्रयेऽलिगे । स्त्रीधनूर्जूकनक्रेऽधो भद्रा तत्रैव तत्फलम् ॥ ४५ ॥ अन्वयः—कुम्भकर्कद्वये अब्जे [चन्द्रे] मर्त्ये [मृत्युलोके], [तथा] अजात् [मेषात्] त्रये अलिगे [अब्जे] स्वर्गे, (तथा) स्त्रीधनूर्जूकनक्रे [अब्जे] अधः [पाताले] भद्रा तिष्ठति । (यत्र तिष्ठति) तत्रैव तत्फलं (भवति) ॥ ४५ ॥ यदि चन्द्रमा कुम्भ, मीन, कर्क वा सिंह में हो तो भद्रा मृत्युलोक में, मेष, वृष, मिथुन वा वृश्चिक में हो तो स्वर्गलोक में और कन्या, तुला, धनु वा मकर में हो तो पाताललोक में भद्रा का निवास जानना। जिस लोक में भद्रा का निवास होता है उसी लोक में उसका शुभाशुभ फल भी होता है ॥ ४५ ॥ शुक्रास्त आदि में वर्जनीय क्रिया वाप्यारामतडागकूपभवनारम्भप्रतिष्ठे व्रता- रम्भोत्सर्गवधूप्रवेशनमहादानानि सोमाष्टके । गोदानाग्रयणप्रपाप्रथमकोपाकर्मवेदव्रतं नीलोद्वाहमथातिपन्नशिशुसंस्कारान्सुरस्थापनम् ॥ ४६ ॥ दीक्षामौञ्जिविवाहमुण्डनमपूर्वं देवतीर्थेक्षणं संन्यासाग्निपरिग्रहौ नृपतिसंदर्शाभिषेकौ गमम् । चातुर्मास्यसमावृती श्रवणयोर्वेधं परीक्षां त्यजेद् वृद्धत्वास्तशिशुत्वइज्यसितयोर्न्यूनाधिमासे तथा ॥ ४७ ॥

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