भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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२२ मुहूर्तचिन्तामणि अन्वयः—इज्यसितयोः वृद्धत्वास्तशिशुत्वे (तथा) न्यूनाधिमासे वाप्यारामतडाग- कूपभवनारम्भप्रतिष्ठे, व्रतारम्भोत्सर्गवधूप्रवेशनमहादानानि, सोमाष्टके गोदानाग्रयण- प्रपाप्रथमकोपाकर्म, वेदव्रतम्, नीलोद्वाहं, अथ अतिपन्नशिशुसंस्कारान्, सुरस्थापनम्, दीक्षामौञ्जिविवाहमुण्डनम्, अपूर्वं देवतीर्थेक्षणम्, संन्यासाग्निपरिग्रहौ नृपतिसंदर्शा- भिषेकौ, गमम्, चातुर्मास्यसमावृत्ती, श्रवणयोर्वेधं, परीक्षां त्यजेत् ॥ ४६-४७ ॥ बावली, बगीचा, तड़ाग, कूप और गृह के बनाने का प्रारम्भ और स्थापना (गृहप्रवेश) ; किसी व्रत का आरम्भ वा उद्यापन, वधूप्रवेश, तुलादान आदि महादान, सोमयज्ञ, अष्टकाश्राद्ध, केशान्तकर्म, नवान्न, पौशाला, प्रथम श्रावणीकर्म, वेदारम्भ, काम्य वृषोत्सर्ग पिछड़े हुए जातकर्म नामकर्म आदि संस्कार, देवताओं का स्थापन, मन्त्रग्रहण, यज्ञोपवीत, विवाह, मुण्डन, किसी देवता का प्रथम दर्शन, तीर्थयात्रा, संन्यास, अग्निहोत्रादि के लिए अग्नि का ग्रहण करना, राजा का प्रथम दर्शन, राजा का अभिषेक, यात्रा, चातुर्मास्य नामक योग समावर्तन कर्म, कर्णछेदन, इन सब कर्मों को बृहस्पति और शुक्र के वृद्ध, बाल वा अस्त रहते, मलमास और क्षयमास में न करना चाहिए ॥ ४६-४७ ॥ सिंह और मकर राशि में स्थित बृहस्पति का दोष अस्ते वर्ज्यं सिंहनक्रस्थजीवे वर्ज्यं केचिद्वक्रगे चातिचारे । गुर्वादित्ये विश्वघस्रेऽपि पक्षे प्रोचुस्तद्वद्दन्तरत्नादिभूषाम् ॥ ४८ ॥ अन्वयः—अस्ते वर्ज्यं (कर्म) सिंहनक्रस्थजीवेऽपि वर्ज्यम् । केचित् [आचार्याः] वक्रगे च (तथा) अतिचारे [जीवे] गुर्वादित्ये, विश्वघस्रे पक्षेऽपि (वर्ज्यं) तद्वत् दन्त- रत्नादिभूषां (च) (वर्ज्यं) प्रोचुः ॥ ४८ ॥ बृहस्पति वा शुक्र के अस्त में जिन शुभ कर्मों का निषेध किया है वे सब कर्म सिंह वा मकर राशियों में बृहस्पति के रहते भी वर्ज्य हैं । कोई आचार्य कहते हैं कि बृहस्पति के वक्री रहते वा अतिचार करते और गुर्वा- दित्य अर्थात् सूर्य और बृहस्पति के एकत्र रहते पूर्वोक्त (वाप्यारामेत्यादि) शुभ कर्म न करे । उसी तरह दाँत और रत्न से बने हुए आभूषणों को भी बृहस्पति वा शुक्र के अस्तादि काल में न धारण करे ॥ ४८ ॥ सिंहस्थ बृहस्पतिदोष का परिहार सिंहे गुरौ सिंहलवे विवाहो नेष्टोऽथ गोदोत्तरतश्च यावत् । भागीरथी याम्यतट च दोषो नान्यत्र देशे तपनेऽपि मेषे ॥ ४९ ॥

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