मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० मुहूर्त्तचिन्तामणि नवीन वस्त्र-आभूषण और चूड़ी आदि धारण करने का मुहूर्त पौष्णध्रुवाश्विकरपञ्चकवासवेज्यादित्ये प्रवालरदशंखसुवर्णवस्त्रम्। धार्यं विरिक्तशनिचन्द्रकुजेऽह्निरक्तं भौमे ध्रुवादितियुगे सुभगा न दध्यात् ॥१०॥ अन्वयः—पौष्णध्रुवाश्विकरपञ्चकवासवेज्यादित्ये, विरिक्तशनिचन्द्रकुजेऽह्नि, प्रवाल- रदशंखसुवर्णवस्त्रं धार्यम्। भौमे रक्तं (वस्त्रं धार्यम्) ध्रुवादितियुगे सुभगा न दध्यात् ॥१०॥ रेवती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, धनिष्ठा, पुष्य, पुनर्वसु इन नक्षत्रों में और रिक्ता को छोड़ अन्य तिथियों में सोमवार, मंगल, शनैश्चर को छोड़ अन्य दिनों में मूँगा, दाँत, शंख और सुवर्ण के आभूषण तथा वस्त्र धारण करना चाहिए। मंगल के दिन लालवस्त्र धारण करना चाहिए। तीनों उत्तरा, रोहिणी, पुनर्वसु और पुष्य में सधवा स्त्री नवीन वस्त्र इत्यादि न धारण करे। (कोई आचार्य कहते हैं कि शतभिषा नक्षत्र में भी सधवा स्त्री नवीन वस्त्र-आभूषण इत्यादि का धारण और स्नान न करे। यदि ऐसा कार्य भूल से हो तो अपने पति की पूजा करे तो दोष शान्त होता है) ॥१०॥ नवीन वस्त्र के जलने आदि का शुभाशुभ फल वस्त्राणां नवभागकेषु च चतुष्कोणेऽमरा राक्षसा मध्यत्र्यंशगता नरास्तु सदशे पाशे च मध्यांशयोः। दग्धे वा स्फुटितेऽम्बरे नवतरे पङ्कादिलिप्ते न स- द्रक्षोंशे नृसुरांशयोः शुभमसत्सर्वांशके प्रान्ततः ॥११॥ अन्वयः—वस्त्राणां नवभागकेषु चतुष्कोणे अमरा, मध्यत्र्यंशगताः राक्षसाः तु [पुनः] मध्यांशयोः.. सदशे पाशे नराः (तत्र) रक्षोंऽशे नवतरे अम्बरे दग्धे स्फुटिते पङ्कादिलिप्ते वा न सत्, नृसुरांशयोः शुभं, प्रान्ततः सर्वांशके असत् ॥११॥ यदि कदाचित् पहिनने के दिन नवीन वस्त्र कहीं जल जाय, अथवा फट जाय, अथवा गोबर या कीचड़ लग जाय तो उस वस्त्र में नव भागों की कल्पना करके चारों कोणों के भागों में देवताओं की, मध्य के तीन भागों में राक्षसों की और दोनों छोरों के दोनों मध्य भागों में नरों की कल्पना करे। यदि राक्षसभागों में दाहादि हो तो वस्त्र शुभ नहीं होता अर्थात् मरणकारक होता है, और यदि देव-मनुष्यभागों में दाहादि हो तो शुभ होता है, भोग और