मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनक्षत्रप्रकरण ३१ पुत्र प्राप्तिकारक होता है । यदि राक्षस, देवता, मनुष्य, इन तीनों के भागों में दाहादि हो तो वह वस्त्र शुभकारक नहीं होता । ऐसा ही विचार, शय्या, आसन, खड़ाऊँ इत्यादि में भी करना चाहिए ॥ ११ ॥ वस्त्रनवधाचक्र | देवता शुभ | राक्षस अशुभ | देवता शुभ | | मनुष्य शुभ | राक्षस अशुभ | मनुष्य शुभ | | देवता शुभ | राक्षस अशुभ | देवता शुभ | निन्द्यकाल में भी वस्त्रधारण विप्राज्ञया तथोद्वाहे राज्ञा प्रीत्यार्पितं च यत् । निन्द्येऽपि धिष्ण्ये वारादौ धार्यं वस्त्रं जगुर्बुधाः ॥ १२ ॥ अन्वयः—विप्राज्ञया, तथा उद्वाहे, राज्ञा प्रीत्यार्पित च यत् वस्त्र (तत्) धिष्ण्ये वारादौ निन्द्येऽपि धार्यं (इति) बुधाः जगुः ॥ १२ ॥ ब्राह्मण की आज्ञा से, विवाह में और प्रीतिपूर्वक राजा के दिये हुए वस्त्र को निंद्य भी नक्षत्र और वारादि में धारण करना चाहिए, यह पण्डित लोग कहते हैं ॥ १२ ॥ राजदर्शन, मद्यारम्भ और गो-क्रय-विक्रय का मुहूर्त्त राधामूलमृदुध्रुवर्क्षवरुणक्षिप्रैर्लतापादपा- रोपोऽथो नृपदर्शनं ध्रुवमृदुक्षिप्रश्रवोवासवैः । तीक्ष्णोग्राम्बुपभेषु मद्यमुदितं क्षिप्रान्त्यवह्नीन्द्रभा- दित्येन्द्राम्बुपवासवेषु हि गवां शस्तः क्रयो विक्रयः ॥ १३ ॥ अन्वयः—राधामूलमृदुध्रुवर्क्षवरुणक्षिप्रैः लतापादपारोपः, अथ ध्रुवमृदुक्षिप्रश्रवो- वासवैः नृपदर्शनं, तीक्ष्णोग्राम्बुपभेषु मद्यं उदितम्, क्षिप्रान्त्यवह्नीन्दुभादित्येन्द्राम्बुपवासवेषु गवां क्रयो विक्रयः शस्तो हि ॥ १३ ॥ विशाखा, मूल, मृदुसंज्ञक अर्थात् चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, ध्रुवसंज्ञक अर्थात् तीनों उत्तरा, रोहिणी, शतभिषा और क्षिप्रसंज्ञक अर्थात् अश्विनी, पुष्य, हस्त इन चौदह नक्षत्रों में लता और वृक्ष लगाना चाहिए । ध्रुवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक, श्रवण, धनिष्ठा इन तेरह नक्षत्रों में राजा का