भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 207 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

नक्षत्रप्रकरण ४७ अन्वयः-स्वातीन्द्रपूर्वाशिवसार्पभे ज्वरे मृतिः (स्यात्), अन्त्यमैत्रे रुजः स्थिरता भवेत्, याम्यश्रवोवारुणतक्षभे शिवा घस्राः द्व्यधिपार्कवासवे पक्षः, हि मूलाग्निदास्रे नव, पित्र्ये नखाः, बुध्न्यार्यमेज्यादितिधातृभे नगाः, अब्जवैश्वे मासः। अथ मिश्रेशपित्र्ये, फणिदंशने मृतिः (स्यात्) ॥ ४५-४६ ॥ स्वाती, ज्येष्ठा, तीनों पूर्वा, आर्द्रा और आश्लेषा में जिसे ज्वर हो उसकी मृत्यु होती है। रेवती और अनुराधा में हो तो रोग की स्थिरता होती है, अर्थात् रोग बहुत दिन तक रहता है। भरणी, श्रवण, शतभिष और चित्रा में हो तो गेरह दिन तक; विशाखा, हस्त और धनिष्ठा में हो तो पन्द्रह दिन तक; मूल, कृत्तिका और अश्विनी में हो तो नव दिन तक; मघा में हो तो बीस दिन तक; उत्तराभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, पुष्य, पुनर्वसु, रोहिणी में हो तो सात दिन तक; मृगशिरा और उत्तराषाढ़ में हो तो एक महीने तक ज्वर रहता है। यदि भरणी, आश्लेषा, मूल, कृत्तिका, विशाखा, आर्द्रा वा मघा नक्षत्र में किसी को सर्प काटे तो उसकी मृत्यु होती है। चन्द्रमा बली हो तो शायद बच जाय ॥ ४५-४६ ॥ रोगी के शीघ्र ही मरने का योग रौद्राहिशाक्राम्बुपयाम्यपूर्वाद्दिदैववस्वग्निषु पापवारे। रिक्ताहरिस्कन्ददिने च रोगे शीघ्रं भवेद्रोगिजनस्य मृत्युः ॥ ४७ ॥ अन्वयः-रौद्राहिशाक्राम्बुपयाम्यपूर्वाद्दिदैववस्वग्निषु, पापवारे, रिक्ताहरिस्कन्ददिने च, रोगे रोगिजनस्य शीघ्रं मृत्युर्भवेत् ॥ ४७ ॥ आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, शतभिष, भरणी, तीनों पूर्वा, विशाखा, धनिष्ठा अथवा कृत्तिका नक्षत्र; रविवार, मंगल वा शनैश्चर दिन और चौथि, नवमी, चतुर्दशी, द्वादशी वा छठि तिथि; ऐसे योग में यदि रोग उत्पन्न हो तो रोगी की शीघ्र ही मृत्यु होती है ॥ ४७ ॥ प्रेतक्रिया का मुहूर्त्त क्षिप्राहिमूलेन्दुहरीशवायुभे प्रेतक्रिया स्याज्झषकुम्भगे विधौ। प्रेतस्य दाहं यमदिग्गमं त्यजेच्छय्यावितानं गृहगोपनादिकम् ॥ ४८ ॥ अन्वयः-क्षिप्राहिमूलेन्दुहरीशवायुभे, प्रेतक्रिया स्यात्, विधौ झषकुम्भगे प्रेतस्य दाह, यमदिग्गमं, शय्यावितानं, च गृहगोपनादिकम् त्यजेत् ॥ ४८ ॥ अश्विनी, पुष्य, हस्त, आश्लेषा, मूल, ज्येष्ठा, श्रवण, आर्द्रा और स्वाती