मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ मुहूर्त्तचिन्तामणि द्व्यङ्गे चरे तनुलवे शशिजीवतारा- शुद्धौ करादितिहरीन्द्रकपे परीक्षा ॥ ४३ ॥ अन्वयः-अष्टभूतशनिविष्टिकुजान्, जनुर्भमासौ, मृतौ रविविधू, अपि नाड्याः भानि त्यक्त्वा, द्व्यङ्गे चरे तनुलवे, शशिजीवताराशुद्धौ, करादितिहरीन्द्रकपे, परीक्षा (कार्या) ॥ ४३ ॥ अष्टमी, चतुर्दशी, शनैश्चर, मंगल, भद्रा, जन्मनक्षत्र, जन्ममास, आठवाँ सूर्य, आठवाँ चन्द्रमा, जिस नाड़ी में जन्मनक्षत्र हो उस नाड़ी¹ के सब नक्षत्र, इन सबको छोड़कर हस्त, पुनर्वसु, श्रवण, ज्येष्ठा, शतभिष नक्षत्र में; मिथुन, कन्या, धन, मीन, मेष, कर्क, तुला, मकर लग्न में और इन्हीं राशियों के नवांश में; चन्द्रमा और बृहस्पति का गोचर शुद्ध तथा ताराशुद्धि रहते परीक्षा अर्थात् सत्यासत्य के निर्णय के लिये लोहे का गरम गोला आदि उठवाना शुभ होता है ॥ ४३ ॥ सब शुभ कार्यों में लग्नशुद्धि व्ययाष्टशुद्धोपचये लग्नगे शुभदृग्युते । चन्द्रे त्रिषट्दशायस्थे सर्वारम्भः प्रसिद्धयति ॥ ४४ ॥ अन्वयः-व्ययाष्टशुद्धोपचये लग्नगे शुभदृग्युते, त्रिषड्दशायस्थे चन्द्रे सर्वारम्भः प्रसिद्धयति ॥ ४४ ॥ लग्न से बारहवाँ और आठवाँ स्थान शुद्ध हो, अर्थात् किसी शुभाशुभ ग्रह से युक्त न हो। कर्त्ता के जन्मराशि वा जन्मलग्न से तीसरी, छठी, गेरहवीं, दशवीं इनमें से कोई लग्न हो और शुभग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो। चन्द्रमा लग्न से तीसरे, छठे, दशवें, गेरहवें इनमें से किसी स्थान में हो तब सम्पूर्ण शुभ कर्मों का आरम्भ शुभदायक होता है ॥ ४४ ॥ जिन नक्षत्रों में ज्वर होने से मृत्यु होती है अथवा जितने दिनों तक ज्वर रहता है वह कहते हैं- स्वातीन्द्रपूर्वाशिवसार्पभे मृतिज्वरेन्त्यमैत्रे स्थिरता भवेद्रुजः । याम्यश्रवोवारुणतक्षभे शिवा घस्रा हि पक्षो द्व्यधिपार्कवासवे ॥ ४५ ॥ मूलाग्निदात्रे नव पित्र्यभे नखा बुध्यार्यमेज्यादितिधातृभे नगाः । मासोऽब्जवैश्वेऽथ यमाहि मूलभे मिश्रेशपित्र्ये फणिदंशने मृतिः ॥ ४६ ॥ १—विवाहप्रकरण में कहेंगे ।