भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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नक्षत्रप्रकरण ४५ स्नानं रुजा विरहितस्य जनस्य शस्तं हीने विधौ खलखगैर्भवकेन्द्रकोणे ॥ ४० ॥ अन्वयः—व्यन्त्यादितिध्रुवमघानिलसार्पधिष्ण्ये, रिक्ते तिथौ, चरतनौ, विकवीन्दु- वारे, विधौ हीने, खलखगैः भवकेन्द्रकोणे, (तदा) रुजा विरहितस्य [जनस्य] स्नानं शस्तम् ॥ ४० ॥ रेवती, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मघा, स्वाती और आश्लेषा को छोड़ अन्य नक्षत्रों में; रिक्तासंज्ञक तिथियों में; शुक्रवार और सोमवार को छोड़ अन्य दिनों में, मेष, कर्क, तुला और मकर लग्न में निषिद्ध स्थान में चन्द्रमा के रहते और गेरहवें, पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें स्थान में पापग्रहों के रहते रोग से छूटे हुए पुरुष का स्नान करना शुभदायक होता है ॥ ४० ॥ शिल्पविद्या के प्रारंभ का मुहूर्त्त मृदुध्रुवक्षिप्रचरे ज्ञे गुरौ वा खलग्नगे । विधौ ज्ञजीववर्गस्थे शिल्पविद्या प्रशस्यते ॥ ४१ ॥ अन्वयः—मृदुध्रुवक्षिप्रचरे, ज्ञे खलग्नगे, वा गुरौ खलग्नगे, विधौ ज्ञजीववर्गस्थे शिल्पविद्या प्रशस्यते ॥ ४१ ॥ मृदुसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक और चरसंज्ञक नक्षत्रों में; लग्न और दशवें स्थान में बुध या बृहस्पति के रहते; बुध और बृहस्पति के षड्वर्ग में चन्द्रमा के रहते शिल्पविद्या का प्रारम्भ करना शुभदायक होता है ॥ ४१ ॥ सन्धानमुहूर्त्त सुरेज्यमित्रभाग्येषु चाष्टम्यां तैतिले हरौ । शुक्रदृष्टे तनौ सौम्यवारे सन्धानमिष्यते ॥ ४२ ॥ अन्वयः—सुरेज्यमित्रभाग्येषु, च (तथा) अष्टम्यां, हरौ, तैतिले, शुक्रदृष्टे तनौ, सौम्यवारे सन्धानं इष्यते ॥ ४२ ॥ पुष्य, अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी, अष्टमी, द्वादशी, सोमवार, बुध, बृहस्पति, शुक्रवार, शुक्र से दृष्ट वा युत लग्न और तैतिलनाम करण में सन्धि और मित्रता करना शुभ होता है ॥ ४२ ॥ परीक्षामुहूर्त्त त्यक्त्वाष्टभूतशनिविष्टिकुजान् जनुर्भ- मासौ मृतौ रविविधू अपि भानि नाड्यः ।