मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनक्षत्रप्रकरण ४९ श्रेष्ठोऽर्केज्यविधोर्दिने श्रुतिकरस्वात्यश्विपुष्ये तथा त्वाशौचात्परतो विचार्यमखिलं मध्ये यथासम्भवम् ॥ ५१ ॥ अन्वयः—शुक्रारार्किषु, दर्शभूतमदने नन्दासु, तीक्ष्णोग्रभे, पौष्णे, वारुणभे, त्रिपुष्कर- दिने, न्यूनाधिमासे, अब्दात्परतः याम्ये अयने, च पातपरिघे, देवेज्यशुक्रास्तके, भद्रावैधृ- तयोः, सिते पक्षे, शवप्रतिकृतेर्दाहः न (कार्यः) जन्मप्रत्यरितारयोः, अब्जे मृतिसुखान्त्ये, कर्तुः न सत्, मैत्रभगादितिध्रुवविशाखाद्वयङ्घ्रिभे, च ज्ञेऽपि कर्तुः मध्यः अर्केज्यविधोर्दिने, श्रुतिकरस्वात्यश्विपुष्ये, कर्तुः श्रेष्ठः (स्यात्) । (इदं) अखिलं अशौचात्परतः विचार्यम्, मध्ये तु यथासम्भवं (कार्यम्) ॥ ५०-५१ ॥ शुक्र, मंगल, शनैश्चर दिन में; अमावस, चतुर्दशी, त्रयोदशी, परीवा, छठि, एकादशी तिथि में; मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, भरणी, मघा, रेवती, शतभिष नक्षत्र में; त्रिपुष्कर योग, क्षयमास, मलमास, जिसे मरे हुए एक वर्ष से अधिक हो गया हो उसका दक्षिणायन, व्यतीपात योग, परिघ योग, बृहस्पति और शुक्र का अस्त, वैधृति योग, भद्रा और शुक्लपक्ष में शवप्रतिकृतिदाह न करे। कोई आचार्य आषाढ़, पौष और हरिशयन में भी निषेध करते हैं ॥ ५० ॥ कर्त्ता की जन्मतारा अर्थात् जन्मनक्षत्र और जन्मनक्षत्र से दशवाँ वा उन्नीसवाँ नक्षत्र और प्रत्यरि तारा अर्थात् जन्मनक्षत्र से पाँचवाँ, चौदहवाँ और तेइसवाँ नक्षत्र. इनमें और कर्त्ता की जन्मराशि से आठवें, चौथे, बारहवें चन्द्रमा के रहते शवप्रतिकृतिदाह शुभ नहीं होता। अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, रोहिणी, विशाखा, मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा इन नक्षत्रों में और बुधवार में शवप्रतिकृतिदाह मध्यम; रविवार, बृहस्पति और सोमवार में श्रवण, हस्त, स्वाती, अश्विनी, पुष्य नक्षत्र में शवप्रातेकृतिदाह श्रेष्ठ है। मरने के दिन से लेकर दश दिन बीत गये हों तो यह सम्पूर्ण विचार करना चाहिए और दश दिन के भीतर भी यदि श्रेष्ठ मुहूर्त्त मिल जाय तो उत्तम है। यदि सम्भव न हो तो कुछ भी न विचारना चाहिए ॥ ५०-५१ ॥ अभुक्तमूलघटी अभुक्तमूलं हि घटीचतुष्टयं ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवं हि नारदः । वशिष्ठ एकद्विघटीमितं जगौ बृहस्पतिस्त्वेकघटीप्रमाणकम् ॥ ५२ ॥ अथोचुरन्ये प्रथमाष्टघटचो मूलस्य शाक्रान्तिमपञ्चनाड्यः । जातं शिशुं तत्र परित्यजेद्वा मुखं पितास्याष्टसमा च पश्येत् ॥ ५३ ॥