मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवं घटिकाचतुष्टय, अभुक्तमूलं (इति) नारदः जगौ, ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवं एकद्विघटीमितं अभुक्तमूलं (इति) वसिष्ठः जगौ, बृहस्पतिस्तु ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवम् एकघटीप्रमाणकम् अभुक्तमूलं स्यादिति जगौ, अथ मूलस्य प्रथमाष्टघटचः, शाक्रान्तिमपञ्चनाड्यः (अभुक्तमूलं स्यादिति) अन्ये ऊचुः, तत्र जातं शिशुं परित्यजेत्, वा पिता अस्य अष्टसमा मुखं न पश्येत् ॥ ५२-५३ ॥ ज्येष्ठा नक्षत्र के अन्त की चार घड़ी और मूल नक्षत्र के आदि की चार घड़ी अभुक्त मूल हैं, यह नारदजी कहते हैं। ज्येष्ठा के अन्त की एक घड़ी और मूल के आदि की दो घड़ी अभुक्त मूल हैं, यह वसिष्ठजी ने कहा है। ज्येष्ठा के अन्त की आधी घड़ी और मूल के आदि की आधी घड़ी अभुक्त- मूल है, यह बृहस्पतिजी ने कहा है॥ ५२ ॥ मूल नक्षत्र के आदि की आठ घड़ी और ज्येष्ठा के अन्त की पाँच घड़ी अभुक्तमूल हैं, यह अन्याचार्यों ने कहा है। अभुक्तमूल में उत्पन्न सन्तान को त्याग दे अथवा आठ वर्ष तक पिता उसका मुख न देखे। अब इस विषय में कोई यह पूछे कि इन अनेक मतों में किसका मत प्रामाणिक है ? तो उसका उत्तर यह है कि बहुत से आचार्यों की सम्मति होने के कारण नारदजी का मत ठीक है ॥ ५२-५३ ॥ मूल और आश्लेषा नक्षत्र में उत्पन्न सन्तान का शुभाशुभ फल आद्ये पिता नाशमुपैति मूलपादे द्वितीये जननी तृतीये । धनं चतुर्थोऽस्य शुभोऽथ शान्त्या सर्वत्र सत्स्यादहिभे विलोमम् ॥ ५४ ॥ अन्वयः—आद्ये मूलपादे पिता नाशं उपैति, द्वितीये जननी, तृतीये धनं (नाशं उपैति) चतुर्थः अस्य (शिशोः) शुभः (स्यात्) शान्त्या सर्वत्र सत्स्यात् । अहिभे विलोमं (भवति) ॥ ५४ ॥ मूल नक्षत्र के पहिले चरण में जन्म होने से पिता का नाश, दूसरे चरण में माता का और तीसरे चरण में धन का नाश होता है। चौथा चरण शुभ- दायक होता है और शान्ति करने से चारों चरणों में शुभ ही होता है। आश्लेषा में इससे विपरीत अर्थात् आश्लेषा के चौथे चरण में यदि किसी का जन्म हो तो उसके पिता का, तीसरे चरण में माता का और दूसरे चरण में धन का नाश होता है तथा पहिला चरण शुभदायक है ॥ ५४ ॥ मूल का निवास स्वर्गे शुचिप्रोष्ठपदेषमाघे भूमौ नभः कार्त्तिकचैत्रपौषे । मूलं ह्यधस्तात्तु तपस्यमार्गवैशाखशुक्रेष्वशुभं च तत्र ॥ ५५ ॥