मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंक्रान्तिप्रकरण ५३ जलाशय-वाटिका-देवप्रतिष्ठा के मुहूर्त्त जलाशयारामसुरप्रतिष्ठा सौम्यायने जीवशशाङ्कशुक्रे । दृश्ये मृदुक्षिप्रचरध्रुवे स्यात्पक्षे सिते स्वर्क्षतिथिक्षण वा ॥ ६० ॥ रिक्तारवर्ज्ये दिवसेऽतिशरता शशाङ्कपापैस्त्रिभवाङ्गसंस्थैः । व्यन्त्याष्टगैः सत्खचरैर्मृगेन्द्रे सूर्यो घटे को युवतौ च विष्णुः ॥ ६१ ॥ शिवो नृयुग्मे द्वितनौ च देव्यः क्षुद्राश्चरे सर्व इमे स्थिरर्क्षे । पुष्ये ग्रहा विघ्नपयक्षसर्पभूतादयोऽन्त्ये श्रवण जिनश्च ॥ ६२ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ नक्षत्रप्रकरणं समाप्तम् ॥ २ ॥ अन्वयः—सौम्यायने, जीवशशाङ्कशुक्रे दृश्ये, मृदुक्षिप्रचरध्रुवे, सिते पक्षे, वा स्वक्षं- तिथिक्षणे, रिक्तारवर्ज्ये दिवसे, शशाङ्कपापैः त्रिभवाङ्गसंस्थैः सत्खचरैः व्यन्त्याष्टगैः (तदा) जलाशयारामसुरप्रतिष्ठा अतिशस्ता स्यात् । मृगेन्द्रे सूर्यः, घटे कः, युवतौ विष्णुः, नृयुग्मे शिवः, च द्वितनौ देव्यः, चरे क्षुद्राः, इमे सर्वे स्थिरर्क्षे [स्थाप्याः ] पुष्ये ग्रहाः, अन्त्ये विघ्नपयक्षसर्पभूतादयः (स्थाप्याः), श्रवणे जिनः (स्थाप्यः) ॥ ६०-६२ ॥ उत्तरायण में; बृहस्पति, चन्द्रमा और शुक्र के उदय रहते; मृदुसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक, चरसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक नक्षत्रों में; शुक्लपक्ष में; जिस देवता की प्रतिष्ठा आदि करना हो उसी के नक्षत्र, तिथि और मुहूर्त्त में; रिक्ता तिथि और मंगल दिन को छोड़ अन्य तिथि और दिवस में तड़ागादि जलाशयों का उत्सर्ग, बगीचे आदि का उत्सर्ग और देवताओं की स्थापना शुभ होती है। लग्न से तीसरे, गेरहवें और छठे स्थान में चन्द्रमा वा पापग्रहों के रहते; आठवें और बारहवें स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में शुभग्रहों के रहते और स्थिर वा द्विस्वभाव लग्नों में सामान्यतः सब देवताओं की प्रतिष्ठा शुभ होती है। परन्तु विशेष यह है कि सिंह लग्न में सूर्य की, कुम्भ में ब्रह्मा की, कन्या में विष्णु की, मिथुन में शिव की, द्विस्वभाव लग्नों में देवी की, चर लग्नों में योगिनी आदि देवियों की, स्थिर लग्नों में उक्तानुक्त सब देवताओं की, पुष्य नक्षत्र में चन्द्रादि आठ ग्रहों की, हस्त नक्षत्र में सूर्य की, रेवती नक्षत्र में गणेश, यक्ष, सर्प, भूतादिकों की और श्रवण नक्षत्र में बुद्ध की स्थापना शुभ होती है ॥ ६०-६२ ॥