मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ मुहूर्त्तचिन्तामणि करती है। मकर की संक्रान्ति को उत्तरायण और कर्क की संक्रान्ति को दक्षिणायन कहते हैं ॥ २-३ ॥ शेष संक्रान्तियों के नाम षडशीत्याननं चापनृयुक्कन्याझषे भवेत् । तुलाजौ विषुवं विष्णुपदं सिंहालिगोघटे ॥ ४ ॥ अन्वयः—चापनृयुक्कन्याझषे षडशीत्याननं, तुलाजौ विषुवं, सिंहालिगोघटे विष्णुपदं (नाम संक्रमणं) भवेत् ॥ ४ ॥ धनु, मिथुन, कन्या और मीन की संक्रान्ति का षडशीतिमुख नाम है; तुला और मेष की संक्रान्ति का विषुव नाम है तथा सिंह, वृश्चिक, वृष और कुम्भ की संक्रान्ति का विष्णुपद नाम है ॥ ४ ॥ संक्रान्ति का पुण्यकाल संक्रान्तिकालादुभयत्र नाडिकाः पुण्या मताः षोडशषोडशोष्णगोः । अन्वयः—उष्णगोः (यः संक्रान्तिकालः तस्मात्) संक्रान्तिकालात् उभयत्र षोडश षोडष नाडिकाः पुण्या मताः । सूर्य की संक्रान्ति जिस समय हो उससे पहले और पश्चात् सोलह- सोलह दण्ड पुण्यकाल मानना चाहिए । गणित से पुण्यकाल जानने की यह रीति है कि सूर्य के बिम्ब की कलाओं को साठ से गुणा करके सूर्य की गति का भाग देने से जो लब्ध हो वही संक्रान्ति से पूर्व-पर पुण्यकाल होता है । रात्रि में संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल निशीथतोऽर्वागपरत्र संक्रमे पूर्वापराहान्तिमपूर्वभागयोः ॥ ५ ॥ अन्वयः—निशीथतः अर्वागपरत्र संक्रमे (सति) (क्रमेण) पूर्वापराहान्तिमपूर्व- भागयोः (पुण्यघटिका भवन्ति) ॥ ५ ॥ यदि आधी रात्रि से पूर्व संक्रान्ति हो तो पूर्व दिन का उत्तरार्द्ध पुण्यकाल और यदि आधी रात्रि के उपरांत संक्रान्ति हो तो पर दिन का पूर्वार्द्ध पुण्यकाल होता है ॥ ५ ॥ आधी रात्रि में होनेवाली संक्रान्ति का पुण्यकाल पूर्णे निशीथे यदि संक्रमः स्याद्दिनद्वयं पुण्यमथोदयास्तात् । पूर्वं परस्ताद्यदि याम्यसौम्यायने दिने पूर्वपरे तु पुण्ये ॥ ६ ॥