मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 207 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ मुहूर्तचिन्तामणि सायन संक्रान्तियों का पुण्यकाल तथायनांशाः खरसाहताश्च स्पष्टार्कगत्या विहृता दिनाद्यैः । मेषादितः प्राक् चलसंक्रमाः स्युर्दाने जपादौ बहुपुण्यदास्ते ॥ ९ ॥ अन्वयः—अयनांशाः खरसाहताः च स्पष्टार्कगत्या विहृताः (लब्धैः) दिनाद्यैः मेषादितः प्राक् चलसंक्रमाः स्युः, ते दाने तथा जपादौ बहुपुण्यदाः ॥ ९ ॥ साठ से गुणे हुए अयनांशों में सूर्य की स्पष्ट गति से भाग देने पर जितने दिनादि लब्ध हों, मेषादि संक्रान्तिकाल से उतने ही दिनादि पूर्व चलसंक्रम अर्थात् अयन संक्रान्तियाँ होती हैं। वे अयन संक्रान्तियाँ दान, जप, होम और श्राद्धादि पुण्य कर्म करने के लिए बहुत पुण्यदायक हैं ॥ ९ ॥ नक्षत्रों की सम, बृहत्, जघन्य संज्ञा समं मृदुक्षिप्रवसुश्रवोग्निमघात्रिपूर्वास्त्रिपभं बृहत्स्यात् । ध्रुवद्विदैवादितभं जघन्यं सार्पाम्बुपाद्रार्निलशाक्रयाम्यम् ॥ १० ॥ अन्वयः—मृदुक्षिप्रवसुश्रवोऽग्निमघात्रिपूर्वास्त्रिपभं समं स्यात्, ध्रुवद्विदैवादितभं बृहत् स्यात्, सार्पाम्बुपाद्रार्निलशाक्रयाम्यं जघन्यं स्यात् ॥ १० ॥ मृगशिरा, रेवती, अनुराधा, चित्रा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, धनिष्ठा, श्रवण, कृत्तिका, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद और मूल नक्षत्र की सम संज्ञा, रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, विशाखा और पुनर्वसु की बृहत्संज्ञा तथा आश्लेषा, शतभिष, आर्द्रा, स्वाती, ज्येष्ठा और भरणी की जघन्य संज्ञा है ॥ १० ॥ उक्त संज्ञाओं का प्रयोजन जघन्यभे संक्रमणे मुहूर्त्ताः शरेन्दवो बाणकृता बृहत्सु । खरामसंख्या समभे महर्घं समर्धसाम्यं विधुदर्शनेऽपि ॥ ११ ॥ अन्वयः—जघन्यभे संक्रमणे शरेन्दवः मुहूर्त्ताः, बृहत्सु बाणकृताः मुहूर्त्ताः, समभे खरामसङ्ख्याः मुहूर्त्ताः, (तत्र) महर्घसमर्घसाम्यं (क्रमात्फलं ज्ञेयम्) । विधुदर्शनेऽपि (एवं फलं भवति) ॥ ११ ॥ १—वर्त्तमान शाके में चारसौ चवालीस घटाकर उसमें साठ का भाग देने से अयनांश स्पष्ट होता है। यथा शाके १८१४ में ४४४ घटाया, १३७० शेष रहे, इनमें साठ का भाग दिया तो २२ । ५० हुए, यही लब्ध अयनांश हुआ।