भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 207 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

संक्रान्तिप्रकरण ५९ जघन्यसंज्ञक नक्षत्रों में संक्रान्ति हो तो पन्द्रह मुहूर्त्त, बृहत्संज्ञक नक्षत्रों में संक्रान्ति हो तो पैंतालिस मुहूर्त्त और समसंज्ञक नक्षत्रों में संक्रान्ति हो तो तीस मुहूर्त्त होते हैं। जिस महीने की संक्रान्ति में पन्द्रह मुहूर्त्त होते हैं उस महीने में अन्न महँगा और जिस महीने की संक्रान्ति में पैंतालिस मुहूर्त्त होते हैं उस महीने में अन्न सस्ता और जिस महीने की संक्रान्ति में तीस मुहूर्त्त होते हैं उस महीने में अन्न न महँगा न सस्ता, किन्तु समभाव बिकता है। चन्द्रोदय में भी ऐसे ही अन्न का भाव जानना चाहिए अर्थात् जघन्यसंज्ञक नक्षत्रों में प्रथम चन्द्रमा का उदय हो तो उस महीने भर अन्न महँगा, बृहत्संज्ञक नक्षत्रों में चन्द्रमा का उदय हो तो उस महीने में अन्न सस्ता और समसंज्ञक नक्षत्रों में चन्द्रमा का उदय हो तो उस महीने में अन्न समभाव बिकता है ॥ ११ ॥ • कर्क संक्रान्ति के रविवारादि में अब्दविंशोपक अर्कादिवारे संक्रान्तौ कर्कस्याब्दविंशोपकाः । दिशो नखा गजाः सूर्या धृत्योऽष्टादश सायकाः ॥ १२ ॥ अन्वयः—अर्कादिवारे कर्कस्य संक्रान्तौ (क्रमात्) दिशः, नखाः, गजाः, सूर्याः, धृत्यः अष्टादश, सायकाः, (एते) अब्दविंशोपकाः (ज्ञेयाः) ॥ १२ ॥ कर्क की संक्रान्ति यदि रविवार को हो तो दश, सोमवार को बीस, मंगल को आठ, बुधवार को बारह, बृहस्पति को अठारह, शुक्रवार को भी अठारह और शनैश्चर को पाँच अब्दविंशोपक होते हैं ॥ १२ ॥ कर्क संक्रान्ति में अब्दविंशोपकचक्र

रविवारसोमवारमंगलवारबुधवारबृहस्पतिशुक्रवारशनैश्चर
१०२०१२१८१८
स्यात्तैतिले नागचतुष्पदे रविः सुप्तो निविष्टस्तु गरादिपञ्चके ।
किंस्तुघ्न ऊर्ध्वः शकुनौ सकौलवेऽनिष्टः समः श्रेष्ठ इहार्घवर्षणे ॥ १३ ॥
अन्वयः—तैतिले नागचतुष्पदे (करणे) रविः सुप्तः (सन् संक्रमितः स्यात्) तु
(पुनः) गरादिपञ्चके निविष्टः (सन् संक्रमितः स्यात्) किंस्तुघ्ने (तथा) सकौलवे
शकुनौ ऊर्ध्व (सन् संक्रमितः स्यात्) इह अर्घवर्षणे (क्रमात्) नेष्टः, समः, श्रेष्ठः
(स्यात्) ॥ १३ ॥