मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ मुहूर्तचिन्तामणि अन्वयः—रविकुजौ राश्यादिगौ फलदौ, सितेज्यौ मध्य फलदौ, शशिसुतः सदा फलदः, अब्जमन्दौ चरमे फलदौ, (तथा) रविवासरादौ जनिभे (सति) मासि [तस्मिन् मासे] (क्रमेण) अध्वाश्ववह्निभयसन्मतिवस्त्रसौख्यदुःखानि भवन्ति ॥ १६ ॥ सूर्य और मंगल राशि के पहले दशांश में फलदायक होते हैं। बृहस्पति और शुक्र राशि के मध्य दशांश में और बुध सदा अर्थात् जब तक राशि में रहे तब तक फलदायक होता है। चन्द्रमा और शनैश्चर राशि के अंतिम दशांश में फल देते हैं। अब चान्द्रमास में जिस वासर में जन्मनक्षत्र का प्रवेश हो उस वासर का फल कहते हैं। शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर अमावास्या तक जन्मनक्षत्र का प्रवेश यदि रविवार में हो तो रास्ता चलना पड़े, सोमवार में हो तो उत्तम अन्न मिले, मङ्गल में हो तो अग्निभय, बुधवार में हो तो उत्तम मति, बृहस्पति में हो तो वस्त्रप्राप्ति, शुक्रवार में हो तो सौख्य और शनैश्चर में हो तो दुःख मिले ॥ १९ ॥ ─── संस्कारप्रकरण ─:०:─ आद्यं रजः शुभं माघमार्गराधेेषफाल्गुने । ज्येष्ठ श्रावणयोः शुक्ले सद्बारे सत्त नौ दिवा ॥ १ ॥ अन्वयः—माघमार्गराधेेषफाल्गुने ज्येष्ठश्रावणयोः, शुक्ले, सद्बारे, सत्त नौ, दिवा (द्विसे) आद्यं रजः शुभम् ॥ १ ॥ माघ, अगहन, वैशाख, आश्विन, फाल्गुन, ज्येष्ठ, श्रावण इन महीनों में शुक्लपक्ष में, शुभग्रहों के वासर में, शुभग्रह से दृष्ट, युत वा शुभग्रह की लग्न में और दिन में पहिले पहिल रजोधर्शन हो तो शुभ होता है ॥ १ ॥ प्रथम रजोधर्शन में उत्तम, मध्यम, निकृष्ट नक्षत्र श्रुतित्रय मृदुक्षिप्रध्रुवस्वाती सिताम्बरे । मध्यं च मूलादितिभे पितृमिश्रे परेष्वसत् ॥ २ ॥ अन्वयः—श्रुतित्रयमृदुक्षिप्रध्रुवस्वाती सिताम्बरे (आद्यं रजः शुभं स्यात्) मूला- दितिभे पितृमिश्रे मध्यं (स्यात्) परेषु (नक्षत्रेषु) असत् (स्यात्) ॥ २ ॥