मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कारप्रकरण ७७ पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, नवें और पाँचवें स्थान में शुभग्रह स्थित हों; तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रह हों; सूर्य, मंगल वा बृहस्पति लग्न को देखते हों; विषम राशि वा विषम नवांश में चन्द्रमा स्थित हो, ऐसे लग्न में और रजोदर्शन के बाद चौथी, छठी, आठवीं, दशवीं, बारहवीं, चौदहवीं, सोलहवीं रात्रि में गर्भाधान शुभ होता है। चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य और अश्विनी नक्षत्र में गर्भाधान मध्यम फलदायक होता है ॥ ७॥ सीमन्तोन्नयनमुहूर्त्त जीवार्कारदिने मृगेज्यनिर्ऋतिश्रोत्रादितिब्रध्नभै रिक्तामर्करसाष्टवर्ज्यतिथिभिर्मासाधिपे पीवरे। सीमन्तोऽष्टमषष्ठमासि शुभदैः केन्द्रत्रिकोणे खलै- र्लभारित्रिषु वा ध्रुवान्त्यसदहे लग्ने च पुंभांशके ॥ ८ ॥ अन्वयः—जीवार्कारदिने मृगेज्यनिर्ऋतिश्रोत्रादितिब्रध्नभैः, रिक्तामर्करसाष्टवर्ज्य- तिथिभि मासाधिपे पीवरे, अष्टमषष्ठमासि, शुभदैः (शुभग्रहैः) केन्द्रत्रिकोणे, खलैः (पापग्रहैः) लाभारित्रिषु (स्थितैः) वा ध्रुवान्त्यसदहे, पुंभांशके लग्ने सीमन्तः शुभः ॥ ८ ॥ बृहस्पति, रविवार और मंगलवार में; मृगशिरा, पुष्य, मूल, श्रवण, पुनर्वसु और हस्त नक्षत्रों में; चौथि, नवमी, चतुर्दशी, अमावास्या, द्वादशी, छठि और अष्टमी को छोड़ अन्य तिथियों में; मासेश्वर¹ के बली रहते, गर्भाधान से आठवें या छठे मास में; केन्द्रत्रिकोण अर्थात् लग्न, चौथा, सातवाँ, दशवाँ, नवाँ, पाँचवाँ इन स्थानों में शुभग्रहों के रहते; गेरहवें, छठे, तीसरे स्थान में क्रूरग्रहों के रहते और पुरुषसंज्ञक ग्रहों के लग्न वा नवांश के सीमन्तोन्नयन कर्म श्रेष्ठ है। अथवा तीनों उत्तरा, रोहिणी और रेवती इन नक्षत्रों में और चन्द्रमा, बुध, बृहस्पति, शुक्र, इन ग्रहों के वासर में और दोपहर से पूर्व शुक्लपक्ष में सीमन्तोन्नयन कर्म करना श्रेष्ठ है। छठे, आठवें मास होने के कारण इनमें गुरुशुक्रास्तादि का विचार कम किया जाता है ॥ ८ ॥ गर्भाधान से प्रसवपर्यंत महीनों के स्वामी मासेश्वराः सितकुजेज्यरवीन्दु- सौरिचन्द्रात्मजास्तनुपचन्द्रदिवाकराः स्युः। १—आगे कहेंगे।