भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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संस्कारप्रकरण ७९ अन्वयः—पर्वाख्यरिक्तोनेतिथौ, शुभेह्नि, एकादशे अपि द्वादशके घस्रे, मृदुध्रुव- क्षिप्रचरेषु शिशोः तत् जातकर्मादि विधेयं स्यात् ॥ ११ ॥ पर्व अर्थात् कृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पौर्णमासी, सूर्य- संक्रान्ति तथा चौथि, नवमी और चतुर्दशी को छोड़ अन्य तिथियों में, व्यतीपातादि दोषरहित शुभग्रहों के दिन में; जन्मकाल से गेरहवें वा बारहवें दिन में; मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित्, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिष नक्षत्र में जातकर्म करे यदि जन्मकाल में किसी कारणवश न किया गया हो । आदि पद से नामकर्म का भी ग्रहण है, अर्थात् इसी मुहूर्त्त में नामकर्म भी करना चाहिए ॥ ११ ॥ प्रसूता स्त्री के स्नान का मुहूर्त्त पौष्णध्रुवेन्दुकरवातहयेषु सूती- स्नानं समित्रभरवीज्यकुजेषु शस्तम् । नार्द्रात्रयश्रुतिमघान्तकमिश्रमूल- त्वाष्ट्रे ज्ञसौरिवसुषड्विरिक्ततिथ्याम् ॥ १२ ॥ अन्वयः—समित्रभरवीज्यकुजेषु, पौष्णध्रुवेन्दुकरवातहयेषु, सूतीस्नानं शस्तम्; आर्द्रात्रयश्रुतिमघान्तकमिश्रमूलत्वाष्ट्रे ज्ञसौरिवसुषड्विरिक्ततिथ्यां सूतीस्नान न शस्तम् ॥ १२ ॥ रेवती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाती, अश्विनी और अनुराधा नक्षत्र में, रविवार, मङ्गल वा बृहस्पतिवार में प्रसूता स्त्री का स्नान करना शुभ है। आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, श्रवण, मघा, भरणी, विशाखा, कृत्तिका, मूल और चित्रा नक्षत्र में; बुध और शनिवार में; अष्टमी, षष्ठि, द्वादशी, चौथि, नवमी और चतुर्दशी तिथि में प्रसूता स्त्री स्नान न करे, इनमें स्नान करने से फिर सन्तान नहीं होती ॥ १२ ॥ प्रथम आदि महीनों में बालक के दाँत निकलने का फल मासे चेत्प्रथमे भवेत्सदर्शनो बालो विनश्येत्स्वयं हन्यात्सङ्क्रमतोऽनुजातभगिनीं मात्रग्रजान् द्व्यादिके । षष्ठादौ लभते हि भोगमतुलं तातात्सुखं पुष्टतां लक्ष्मीं सौख्यमथो जनौ सदशनो वोर्ध्वं स्वपित्राविहा ॥ १३ ॥