मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० मुहूर्तचिन्तामणि अन्वयः—चेत् [यदि] प्रथमे मासे बालः सदशनः भवेत् (तदा सः स्वयं नश्येत् । द्वयादिके मासे (चेत् सदशनः) तदा क्रमशः अनुजातभगिनीमातृग्रजान् हन्यात् । षष्ठादौ (क्रमेण) अतुलं भोगं, तातात् सुखं, पुष्टतां, लक्ष्मीं, सौख्य लभते । अथो जनौ (जन्मसमये) सदशनः (बालः) स्वपित्रादिहा (भवति) वा ऊर्ध्वं (ऊर्ध्वपंक्तौ) सदशनः बालः स्वपित्रादिहा (भवति) ॥ १३ ॥ पहिले मास में यदि बालक के दाँत निकलें तो वह बालक मर जाता है। यदि दूसरे मास में निकलें तो छोटे भाई को, तीसरे मास में निकलें तो बहिन को, चौथे मास में जामें तो माता को और पाँचवें मास में जामें तो जेठे भाई को मारता है। यदि छठे मास में दाँत जामें तो वह बालक उत्तम भोग, सातवें मास में जामें तो पिता से सुख, आठवें मास में जामें तो देह की पुष्टता, नवें मास में जामें तो लक्ष्मी, दशवें मास में जामें तो सौख्य, गेरहवें मास में जामें तो अतिसौख्य और बारहवें मास में धन-सम्पत्ति को प्राप्त होता है। यदि गर्भ ही में जामे हुए दांतों के सहित उत्पन्न हो, अथवा ऊपर की पंक्ति में पहिले दाँत जामें तो वह बालक अपने माता-पिता, भाई इत्यादिकों का विनाश करता है ॥ १३ ॥ दोलारोहणमुहूर्त्त दोलारोहेऽर्कभात्पञ्चशरपञ्चेषुसप्तभैः । नैरूज्यं मरणं कार्श्य व्याधिः सौख्यं क्रमाच्छिशोः ॥ १४ ॥ अन्वयः—अर्कभात् पञ्चशरपञ्चेषुसप्तभैः [नक्षत्रैः] दोलारोहे [सति] क्रमात् शिशोः नैरूज्यं, मरणं, कार्श्य, व्याधिः, सौख्यं स्यात् ॥ १४ ॥ सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित हों उस नक्षत्र से पाँच नक्षत्र पर्यन्त बालक को झुलुआ पर चढ़ाकर झुलावे तो वह नीरोग हो, फिर पाँच नक्षत्रों में उस बालक का मरण हो, फिर पाँच नक्षत्रों में वह बालक दुबला हो, फिर पाँच नक्षत्रों में उस बालक के व्याधि हो और फिर सात नक्षत्रों में उस बालक को सौख्य हो ॥ १४ ॥ दन्तार्कभूपधृतिदिङ्मतवासरे स्या- द्वारे शुभे मृदुलघुध्रुवभैः शिशूनाम् । दोलाधिरूढिरथनिष्क्रमणं चतुर्थ- मासे गमोक्तसमयेऽर्कमितेऽह्नि वा स्यात् ॥ १५ ॥