मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 207 में से
संदर्भ में पढ़ें८६ मुहूर्त्तचिन्तामणि वशिष्ठजी से कहा है कि तीन शिखा और तीन वर्णों से संयुक्त, ब्रह्मदण्ड के सदृश. किसी भी दिशा में उदय होनेवाला ब्रह्मपुत्र नामक केतु होता है। यह उदय होकर ब्रह्मा का भी नाश करता है, फिर दूसरों के लिए क्या कहना है। वराहजी ने भी इसका ऐसा ही लक्षण कहा है। अन्य केतुओं के लक्षण गर्गजी ने कहे हैं। तीन शिखा, लाल वर्ण, लाल किरण, सदा उत्तर ही दिशा में उदय, लोहितांगात्मज और कौंकुम नाम के साठ प्रकार के केतु होते हैं। उनके उदय होने से राजाओं में परस्पर संग्राम होता है। कृष्णवर्ण मिली हुई काली किरणोंवाले कीलक नाम के तेंतीस प्रकार के केतु होते हैं, वे उदय होने पर अतिदारुण होते हैं ॥ २६ ॥ शुक्र और बृहस्पति की बाल्य और वृद्ध अवस्था पुरः पश्चाद्भृगोर्बाल्यं त्रिदशाहं च वार्धकम् । पक्षं पंचदिनं ते द्वे गुरोः पक्षमुदाहृते ॥ २७ ॥ अन्वयः—भृगोः पुरः पश्चात् (क्रमेण) त्रिदशाहं बाल्यं, पक्षं पञ्चदिनं च वार्धक (प्रोक्तम्) । गुरोः ते द्वे [बाल्यवार्धके] पक्षं उदाहृते ॥ २७ ॥ यदि शुक्र का उदय पूर्व दिशा में हो तो तीन दिन बाल और पन्द्रह दिन वृद्ध तथा पश्चिम में हो तो दश दिन बाल और पाँच दिन वृद्ध रहता है। बृहस्पति दोनों दिशाओं में उदय से पन्द्रह दिन तक बाल और अस्त से पूर्व पन्द्रह दिन वृद्ध रहता है ॥ २७ ॥ मतान्तर से बाल्य और वृद्ध अवस्था ते दशाहं द्वयोः प्रोक्ते कैश्चित्सप्तदिनं परैः । त्र्यहं त्वात्ययिकेऽप्यन्य र्धाहं च त्र्यहं विधोः ॥ २८ ॥ अन्वयः—कैश्चित् द्वयोः (गुरुशुक्रयोः) ते [बाल्यवार्धके] दशाहं प्रोक्ते, परैः सप्तदिनं प्रोक्ते । अन्यैः आत्ययिके [आवश्यके] त्र्यहं प्रोक्त । विधोः च अर्धाहं बाल्यं, त्र्यहं वार्धकं (प्रोक्तम्) ॥ २८ ॥ कोई आचार्य शुक्र और बृहस्पति दोनों की बाल्य और वृद्धावस्था दश दिन की कहते हैं, कोई सात दिन की कहते हैं और कोई कहते हैं कि यदि किसी कार्य की अति आवश्यकता हो तो तीन ही दिन की मानना चाहिए । चन्द्रमा की बाल्यावस्था आधा दिन और वृद्धावस्था तीन दिन की होती है ॥ २८ ॥