भारतकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 207 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 94

संस्कारप्रकरण ८५ कर्णवेध में लग्नशुद्धि संशुद्धे मृतिभवने त्रिकोणकेन्द्र- त्र्यायस्थैः शुभखचरैः कवीज्यलग्ने । पापाख्यैररिसहजायगेहसंस्थै- र्लग्नस्थे त्रिदशगुरौ शुभावहः स्यात् ॥ २५ ॥ अन्वयः—मृतिभवने संशुद्धे, शुभखचरैः त्रिकोणकेन्द्रत्र्यायस्थैः, कवीज्यलग्ने, पापाख्यैः अरिसहजायगेहसंस्थैः, त्रिदशगुरौ लग्नस्थे, (कर्णवेधः) शुभावहः स्यात् ॥ २५ ॥ लग्न से आठवें स्थान में कोई ग्रह न हो, नवें, पाँचवें, पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, तीसरे, और गेरहवें स्थान में शुभग्रह हों; तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रह और लग्न में बृहस्पति हों; वृष, तुला, धनु वा मीन लग्न हो तो बालक का कर्णवेध शुभ होता है ॥ २५ ॥ मुंडन आदि में निषिद्ध काल गीर्वाणाम्बुप्रतिष्ठापरिणयदहनाधानगेहप्रवेशा- श्चौलं राजाभिषेको व्रतमपि शुभदं नैव याम्यायने स्यात् । नो वा बाल्यास्तवार्ध्ये सुरगुरुसितयोर्नैव केतूदये स्या- त्पक्षं वार्द्धं च केचिज्जहति तमपरे यावदीक्षां तदुग्रे ॥ २६ ॥ अन्वयः—याम्यायने गीर्वाणाम्बुप्रतिष्ठापरिणयदहनाधानगेहप्रवेशाः चौलं, राजा- भिषेकः व्रतं अपि नैव शुभदं स्यात् । वा सुरगुरुसितयोः बाल्यास्तवार्ध्ये अपि नैव शुभदं, वा केतूदये (अपि) नैव शुभद स्यात् । त [केतूदयं] केचित् पक्षं वा अर्धं [पक्षार्धं] जहति, अपरे तदुग्रे [ब्रह्मपुत्राख्ये केतौ] ईक्षां [दर्शनं] यावत् जहति ॥ २६ ॥ देवप्रतिष्ठा, जलाशयप्रतिष्ठा, विवाह, अग्न्याधान, चूडाकर्म, यज्ञोपवीत, राजाभिषेक, गृहप्रवेश और भी जिनका कोई नियत काल नहीं है वे सब शुभ कर्म याम्यायन अर्थात् कर्क संक्रान्ति से मकर संक्रान्ति तक शुभ नहीं होते । बृहस्पति और शुक्र की बाल्यावस्था, अस्त और वृद्धावस्था में और केतु के उदय में भी उक्त कर्म शुभ नहीं होते । कोई आचार्य केतु के उदय में पक्ष भर और कोई आधा पक्ष उक्त कर्म करने में त्याग करते हैं । कोई कहते हैं कि जब तक केतु दीख पड़े तब तक ये उक्त कर्म नहीं करना चाहिए, यह उनका कहना उग्र अर्थात् ब्रह्मपुत्र नामक अति दुष्ट फल देनेवाले केतु के उदय में समझना चाहिए । ब्रह्मपुत्र नामक केतु का लक्षण