| .११० | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक ३ |
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| किं तर्हि? तद्ब्रह्मैवाद्वयमात्मत्वेन प्रतिपद्य धीरा अत्यन्तविवेकिनो युक्तात्मानो नित्यसमाहितस्वभावाः सर्वमेव समस्तं शरीरपातकालेऽप्याविशन्ति भिन्ने घटे घटाकाशवदविद्याकृतोपाधिपरिच्छेदं जहति । एवं ब्रह्मविदो ब्रह्मधाम प्रविशन्ति ॥ ५ ॥ | प्राप्त कर—फिर क्या होता है ? उस अद्वयब्रह्मको ही आत्मभावसे अनुभव कर, वे धीर यानी अत्यन्त विवेकी और युक्तात्मा—नित्य समाहितस्वभाव पुरुष शरीरपातके समय भी सर्वरूप ब्रह्ममें ही प्रवेश कर जाते हैं; अर्थात् घटके फूट जानेपर घटाकाशके समान वे अपने अविद्याजनित परिच्छेदका परित्याग कर देते हैं। इस प्रकार वे ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मधाममें प्रवेश करते हैं ॥ ५ ॥ |
ज्ञातज्ञेयकी मोक्षप्राप्ति
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः
संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले
परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥
जिन्होंने वेदान्तजनित विज्ञानसे ज्ञेय अर्थका अच्छी तरह निश्चय कर लिया है वे संन्यासयोगसे यत्न करनेवाले समस्त शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोकमें देह त्याग करते समय परम अमरभावको प्राप्त हो सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥
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| वेदान्तजनितविज्ञानं वेदान्तविज्ञानं तस्यार्थः परमात्मा | वेदान्तसे उत्पन्न होनेवाला विज्ञान वेदान्तविज्ञान कहलाता है। उसका अर्थ यानी विज्ञेय परमात्मा |