मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
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| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १११ |
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| विज्ञेयः सोऽर्थः सुनिश्चितो येषां | है। वह अर्थ जिन्हें अच्छी तरह |
| ते वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः। | निश्चित हो गया है वे 'वेदान्त- |
| ते च संन्यासयोगात्सर्वकर्मपरि- | विज्ञानसुनिश्चितार्थ' कहलाते हैं। |
| त्यागलक्षणयोगात्केवलब्रह्मनिष्ठा- | वे संन्यासयोगसे—सर्वकर्मपरित्याग- |
| स्वरूपाद्योगाद्यतयो यतनशीलाः | रूप योगसे अर्थात् केवल ब्रह्मनिष्ठा- |
| शुद्धसत्त्वाः शुद्धं सत्त्वं येषां | स्वरूप योगसे यत्न करनेवाले और |
| संन्यासयोगात्ते शुद्धसत्त्वाः । ते | शुद्धसत्त्व—संन्यासयोगसे जिनका |
| ब्रह्मलोकेषु—संसारिणां ये मरण- | सत्त्व (चित्त) शुद्ध हो गया है ऐसे वे |
| कालास्तेऽपरान्तास्तानपेक्ष्य मुमु- | शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोकोंमें परामृत— |
| क्षूणां संसारावसाने देहपरित्याग- | परम अमृत यानी अमरणधर्मा ब्रह्म |
| कालः परान्तकालस्तस्मिन्परा- | ही जिनका आत्मस्वरूप हैं ऐसे |
| न्तकाले साधकानां बहुत्वान्ब्रह्मैव | जीवित अवस्थामें ही परामृत यानी |
| लोको ब्रह्मलोक एकोऽप्यनेकवद् | ब्रह्मभूत होकर दीपनिर्वाण अथवा |
| दृश्यते प्राप्यते वा, अतो बहुवचनं | [घटके फूटनेपर] घटाकाशके समान |
| ब्रह्मलोकेष्विति ब्रह्मणीत्यर्थः— | परिमुक्त यानी निवृत्तिको प्राप्त हो |
| परामृताः परममृतममरणधर्मकं | जाते हैं। वे सब परि अर्थात् |
| ब्रह्मात्मभूतं येषां ते परा- | सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं। |
| मृता जीवन्त एव ब्रह्मभूताः | किसी अन्य गन्तव्य देशान्तरकी |
| परामृताः सन्तः परिमुच्यन्ति परि | अपेक्षा नहीं करते। संसारी पुरुषों- |
| समन्तात्प्रदीपनिर्वाणवद् घटा- | के जो अन्तकाल होते हैं वे |
| 'अपरान्तकाल' हैं उनकी अपेक्षा | |
| मुमुक्षुओंके संसारका अन्त हो | |
| जानेपर उनका जो देहपरित्याग- | |
| का समय है वह 'परान्तकाल' है। | |
| उस परान्तकालमें वे ब्रह्मलोकोंमें— | |
| बहुत-से साधक होनेके कारण यहाँ |