भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ११३
संसारबन्धापनयनमेव मोक्षम् इच्छन्ति ब्रह्मविदो न तु कार्यभूतम् ॥ ६ ॥बन्धनकी निवृत्तिरूप मोक्षकी ही इच्छा करते हैं, किसी कार्यभूत पदार्थकी नहीं ॥ ६ ॥

मोक्षका स्वरूप

किं च मोक्षकाले—तथा मोक्षकालमें—

गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ७ ॥

[ प्राणादि ] पन्द्रह कलाएँ ( देहारम्भक तत्त्व ) अपने आश्रयोंमें स्थित हो जाती हैं, [ चक्षु आदि इन्द्रियोंके अधिष्ठाता ] समस्त देवगण अपने प्रतिदेवता [ आदित्यादि ] में लीन हो जाते हैं तथा उसके [ सञ्चितादि ] कर्म और विज्ञानमय आत्मा आदि सब-के-सब पर अव्यय देवमें एकीभावको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥

या देहारम्भिकाः कलाः प्राणाद्यास्ताः स्वां स्वां प्रतिष्ठां गताः स्वं स्वं कारणं गता भवन्तीत्यर्थः । प्रतिष्ठा इति द्वितीयाबहुवचनम् । पञ्चदश पञ्चदशसंख्याका या अन्त्यप्रश्नपरिपठिताः प्रसिद्धा देवाश्च देहाश्रयाश्चक्षुरादिकरणस्थाः सर्वे प्रतिदेवतास्वादित्यादिषु गता भवन्तीत्यर्थः ।जो देहकी आरम्भ करनेवाली प्राणादि कलाएँ हैं वे अपनी प्रतिष्ठाको पहुँचती अर्थात् अपने-अपने कारणको प्राप्त हो जाती हैं । [ इस मन्त्रमें ] 'प्रतिष्ठाः' यह द्वितीया विभक्तिका बहुवचन है । पन्द्रह प्रसिद्ध कलाएँ जो [ प्रश्नोपनिषद्के ] अन्तिम ( षष्ठ ) प्रश्नमें पढ़ी गयी हैं तथा देहके आश्रित चक्षु आदि इन्द्रियोंमें स्थित समस्त देवता अपने प्रतिदेवता आदित्यादिमें लीन हो जाते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ।