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मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ११३
संसारबन्धापनयनमेव मोक्षम् इच्छन्ति ब्रह्मविदो न तु कार्यभूतम् ॥ ६ ॥बन्धनकी निवृत्तिरूप मोक्षकी ही इच्छा करते हैं, किसी कार्यभूत पदार्थकी नहीं ॥ ६ ॥

मोक्षका स्वरूप

किं च मोक्षकाले—तथा मोक्षकालमें—

गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ ७ ॥

[ प्राणादि ] पन्द्रह कलाएँ ( देहारम्भक तत्त्व ) अपने आश्रयोंमें स्थित हो जाती हैं, [ चक्षु आदि इन्द्रियोंके अधिष्ठाता ] समस्त देवगण अपने प्रतिदेवता [ आदित्यादि ] में लीन हो जाते हैं तथा उसके [ सञ्चितादि ] कर्म और विज्ञानमय आत्मा आदि सब-के-सब पर अव्यय देवमें एकीभावको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥

या देहारम्भिकाः कलाः प्राणाद्यास्ताः स्वां स्वां प्रतिष्ठां गताः स्वं स्वं कारणं गता भवन्तीत्यर्थः । प्रतिष्ठा इति द्वितीयाबहुवचनम् । पञ्चदश पञ्चदशसंख्याका या अन्त्यप्रश्नपरिपठिताः प्रसिद्धा देवाश्च देहाश्रयाश्चक्षुरादिकरणस्थाः सर्वे प्रतिदेवतास्वादित्यादिषु गता भवन्तीत्यर्थः ।जो देहकी आरम्भ करनेवाली प्राणादि कलाएँ हैं वे अपनी प्रतिष्ठाको पहुँचती अर्थात् अपने-अपने कारणको प्राप्त हो जाती हैं । [ इस मन्त्रमें ] 'प्रतिष्ठाः' यह द्वितीया विभक्तिका बहुवचन है । पन्द्रह प्रसिद्ध कलाएँ जो [ प्रश्नोपनिषद्के ] अन्तिम ( षष्ठ ) प्रश्नमें पढ़ी गयी हैं तथा देहके आश्रित चक्षु आदि इन्द्रियोंमें स्थित समस्त देवता अपने प्रतिदेवता आदित्यादिमें लीन हो जाते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ।
११४मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
यानि च मुमुक्षुणा कृतानि कर्माण्यप्रवृत्तफलानि प्रवृत्तफलानामुपभोगेनैव क्षीयमाणत्वाद्विज्ञानमयश्चात्माविद्याकृतबुद्ध्याद्युपाधिमात्मत्वेन मत्वा जलादिषु सूर्यादिप्रतिबिम्बवदिह प्रविष्टो देहभेदेषु, कर्मणां तत्फलार्थत्वात्, सह तेनैव विज्ञानमयेनात्मना, अतो विज्ञानमयो विज्ञानप्रायः; त एते कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मोपाध्यपनये सति परेऽव्ययेऽनन्तेऽक्षये ब्रह्मण्यकाशकल्पेऽजेऽजरेऽमृतेऽभयेऽपूर्वेऽनपरेऽनन्तरेऽबाह्येऽद्वये शिवे शान्ते सर्व एकीभवन्त्यविशेषतां गच्छन्ति एकत्वमापद्यन्ते जलाद्याधारापनय इव सूर्यादिप्रतिबिम्बाः सूर्ये घटाद्यपनय इवाकाशे घटाद्याकाशाः ॥ ७ ॥तथा मुमुक्षुके किये हुए अप्रवृत्तफल कर्म—क्योंकि जो कर्म फलोन्मुख हो जाते हैं वे उपभोगसे ही क्षीण होते हैं—और विज्ञानमय आत्मा, जो अविद्याजनित बुद्धि आदि उपाधिको आत्मभावसे मानकर जलादिमें सूर्यादिके प्रतिबिम्बके समान यहाँ देहभेदोंमें प्रविष्ट हो रहा है, उस विज्ञानमय आत्माके सहित [ परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं ], क्योंकि कर्म उस विज्ञानमय आत्माको ही फल देनेवाले हैं। अतः विज्ञानमयका अर्थ विज्ञानप्राय है। ऐसे वे [ सञ्चितादि ] कर्म और विज्ञानमय आत्मा सभी, उपाधिके निवृत्त हो जानेपर आकाशके समान, पर, अव्यय, अनन्त, अक्षय, अज, अजर, अमृत, अभय, अपूर्व, अनन्य, अनन्तर, अवाह्य, अद्वय, शिव और शान्त ब्रह्ममें एकरूप हो जाते हैं—अविशेषता अर्थात् एकताको प्राप्त हो जाते हैं, जिस प्रकार कि जल आदि आधारके हटा लिये जानेपर सूर्य आदिके प्रतिबिम्ब सूर्यमें तथा घटादिके निवृत्त होनेपर घटाकाशादि महाकाशमें मिल जाते हैं ॥ ७ ॥

खण्ड २ ] : शाङ्करभाष्यार्थ ११५


ब्रह्मप्राप्तिमें नदी आदिका दृष्टान्त

किं च— । तथा—

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे-
ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः
परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८ ॥

जिस प्रकार निरन्तर बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूपको त्यागकर समुद्रमें अस्त हो जाती हैं उसी प्रकार विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

यथा नद्यो गङ्गाद्याः स्यन्द-<br>माना गच्छन्त्यः समुद्रे समुद्रं<br>प्राप्यास्तमदर्शनमविशेषात्मभावं<br>गच्छन्ति प्राप्नुवन्ति नाम च<br>रूपं च नामरूपे विहाय हित्वा<br>तथाविद्याकृतनामरूपाद्विमुक्तः<br>सन्विद्वान्परादक्षरात्पूर्वोक्तात्परं<br>दिव्यं पुरुषं यथोक्तलक्षणमुपैति<br>उपगच्छति ॥ ८ ॥जिस प्रकार बहकर जाती हुई गङ्गा आदि नदियाँ समुद्रमें पहुँचने-पर अपने नाम और रूपको त्यागकर अस्त—अदर्शन यानी अविशेष भावको प्राप्त हो जाती हैं उसी प्रकार विद्वान् अविद्याकृत नाम-रूपसे मुक्त हो पूर्वोक्त अक्षर (अव्याकृत) से भी पर उपर्युक्त लक्षणविशिष्ट पुरुषको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है

ननु श्रेयस्यनेके विघ्नाः<br>प्रसिद्धा अतः क्लेशानामन्यतमे-<br>नान्येन वा देवादिना च विघ्नितोशङ्का—कल्याणपथमें अनेकों विघ्न आया करते हैं—यह प्रसिद्ध है। अतः क्लेशोंमेंसे किसी-न-किसी-के द्वारा अथवा किसी देवादिद्वारा
११६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
ब्रह्मविद्प्यन्यां गतिं मृतो गच्छति न ब्रह्मैव ।विघ्न उपस्थित कर दिये जानेसे ब्रह्मवेत्ता भी मरनेपर किसी दूसरी गतिको प्राप्त हो जायगा—ब्रह्मको ही प्राप्त न होगा ।
न; विद्ययैव सर्वप्रतिबन्धस्यापनीतत्वात् । अविद्याप्रतिबन्धमात्रो हि मोक्षो नान्यप्रतिबन्धः, नित्यत्वादात्मभूतत्वाच्च। तस्मात्—**समाधान—**नहीं, विद्यासे ही समस्त प्रतिबन्धोंके निवृत्त हो जानेके कारण [ ऐसा नहीं होगा ] । मोक्ष केवल अविद्यारूप प्रतिबन्धवाला ही है, और किसी प्रतिबन्ध-वाला नहीं है, क्योंकि वह नित्य और सबका आत्मस्वरूप है । इसलिये—

स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९ ॥

जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है । उसके कुलमें कोई अब्रह्मवित् नहीं होता । वह शोकको तर जाता है, पापको पार कर लेता है और हृदयग्रन्थियोंसे विमुक्त होकर अमरत्व प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥

स यः कश्चिद् द्वै लोके तत्परमं ब्रह्म वेद साक्षादहमेवास्मीति स नान्यां गतिं गच्छति । देवैरपि तस्य ब्रह्मप्राप्तिं प्रति विघ्नो न शक्यते कर्तुम् । आत्मा ह्येषां सइस लोकमें जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है—‘वह साक्षात् मैं ही हूँ’ ऐसा समझ लेता है, वह किसी अन्य गतिको प्राप्त नहीं होता । उसकी ब्रह्मप्राप्तिमें देवतालोग भी विघ्न उपस्थित नहीं कर सकते, क्योंकि वह तो उनका

'खण्ड २ ] : शाङ्करभाष्यार्थ ११७


भवति । तस्माद्ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति ।<br><br>किं च नास्य विदुषोऽब्रह्मवित्कुले भवति । किं च तरति शोकमनेकेष्टवैकल्यनिमित्तं मानसं सन्तापं जीवन्नेवातिक्रान्तो भवति । तरति पाप्मानं धर्माधर्माख्यम् । गुहाग्रन्थिभ्यो हृदयाविद्याग्रन्थिभ्यो विमुक्तः सन्नमृतो भवतीत्युक्तमेव भिद्यते हृदयग्रन्थिरित्यादि ॥ ९ ॥आत्मा ही हो जाता है। अतः ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही हो जाता है।<br><br>तथा इस विद्वान्‌के कुलमें कोई अब्रह्मवित् नहीं होता और यह शोकको तर जाता है अर्थात् अनेकों इष्ट वस्तुओंके वियोगजनित सन्तापको जीवित रहते हुए ही पार कर लेता है तथा धर्माधर्मसंज्ञक पापसे भी परे हो जाता है। फिर हृदयग्रन्थियोंसे विमुक्त हो अमृत हो जाता है, जैसा कि 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्यादि मन्त्रोंमें कहा ही है ॥ ९ ॥

विद्याप्रदानकी विधि

अथेदानीं ब्रह्मविद्यासम्प्रदानविध्युपदर्शनेनोपसंहारः क्रियते।तदनन्तर अब ब्रह्मविद्याप्रदानकी विधिका प्रदर्शन करते हुए [ इस ग्रन्थका ] उपसंहार किया जाता है—

तदेतदृचाभ्युक्तम्—

क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः
स्वयं जुह्वत एकर्षिं श्रद्धयन्तः ।
तेषामेवैषां ब्रह्मविद्यां वदेत
शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ॥ १० ॥

११८मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

यही बात [आगेकी] ऋचाने भी कही है—जो अधिकारी क्रियावान् श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ और स्वयं श्रद्धापूर्वक एकर्षि नामक अग्निमें हवन करनेवाले हैं तथा जिन्होंने विधिपूर्वक शिरोव्रतका अनुष्ठान किया है उन्हींसे यह ब्रह्मविद्या कहनी चाहिये ॥ १० ॥

तदेतद्विद्यासम्प्रदानविधान-यह विद्यासम्प्रदानकी विधि
मृचा मन्त्रेणाभ्युक्तमभिप्रका-[आगेकी] ऋचा यानी मन्त्रने भी
शितम्—प्रकाशित की है—
क्रियावन्तो यथोक्तकर्मा-जो क्रियावान्—जैसा ऊपर
नुष्ठानयुक्ताः, श्रोत्रिया ब्रह्म-बतलाया गया है वैसे कर्मानुष्ठानमें
निष्ठा अपरस्मिन्ब्रह्मण्यभियुक्ताःलगे हुए, श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ
परब्रह्मबुभुत्सवः स्वयमेकर्षि-यानी अपरब्रह्ममें लगे हुए और
नामानमग्निं जुह्वते जुह्वति श्रद्द-परब्रह्मको जाननेके इच्छुक तथा
धन्तः श्रद्दधानाः सन्तो ये तेषाम्स्वयं श्रद्धायुक्त होकर एकर्षि नामक
एव संस्कृतात्मनां पात्रभूतानाम्अग्निमें हवन करनेवाले हैं उन्हीं
एतां ब्रह्मविद्यां वदेत ब्रूयात्शुद्धचित्त एवं ब्रह्मविद्याके पात्रभूत
शिरोव्रतं शिरस्यग्निधारणलक्षणम्,अधिकारियोंको यह ब्रह्मविद्या
यथाथर्वणानां वेदव्रतं प्रसिद्धम्,बतलानी चाहिये, जिन्होंने कि
यैस्तु यैश्च तच्चीर्णं विधिवद्यथा-शिरपर अग्नि धारण करनारूप
विधानं तेषामेव च ॥ १० ॥शिरोव्रतका—जैसा कि अथर्व-
वेदियोंका वेदव्रत प्रसिद्ध है—
विधिवत्—शास्त्रोक्त विधिके
अनुसार अनुष्ठान किया है, उन्हींसे
यह विद्या कहनी चाहिये ॥ १० ॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९


उपसंहार

तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥

उस इस सत्यका पूर्वकालमें अङ्गिरा ऋषिने [ शौनकजीको ] उपदेश किया था। जिसने शिरोव्रतका अनुष्ठान नहीं किया वह इसका अध्ययन नहीं कर सकता। परमर्षियोंको नमस्कार है, परमर्षियोंको नमस्कार है ॥ ११ ॥

तदेतदक्षरं पुरुषं सत्यमृषि-<br>रङ्गिरा नाम पुरा पूर्वं शौनकाय<br>विधिवदुपसन्नाय पृष्टवत उवाच ।<br>तद्वदन्योऽपि तथैव श्रेयोऽर्थिने<br>मुमुक्षवे मोक्षार्थं विधिवदुपसन्नाय<br>ब्रूयादित्यर्थः । नैतद्ग्रन्थरूपम्<br>अचीर्णव्रतोऽचरितव्रतोऽप्यधीते<br>न पठति । चीर्णव्रतस्य हि विद्या<br>फलाय संस्कृता भवतीति ।उस इस अक्षर पुरुष सत्यको अंगिरानामक ऋषिने पूर्वकालमें अपने समीप विधिपूर्वक आये हुए प्रश्नकर्ता शौनकजीसे कहा था। उनके समान अन्य किसी गुरुको भी उसी प्रकार अपने समीप विधिपूर्वक आये हुए कल्याणकामी मुमुक्षुपुरुषको उसके मोक्षके लिये इसका उपदेश करना चाहिये—यह इसका तात्पर्य है। इस ग्रन्थरूप उपदेशका 'अचीर्णव्रत' पुरुष—जिसने कि शिरोव्रतका आचरण न किया हो—अध्ययन नहीं कर सकता, क्योंकि जिसने उस व्रतका आचरण किया होता है उसीकी विद्या संस्कारसम्पन्न होकर फलवती होती है।

१२० मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


समाप्ता ब्रह्मविद्या, सा येभ्यो ब्रह्मादिभ्यः पारम्पर्यक्रमेण संप्राप्ता तेभ्यो नमः परमऋषिभ्यः परमं ब्रह्म साक्षाद्दृष्टवन्तो ये ब्रह्मादयोऽवगतवन्तश्च ते परमर्षयस्तेभ्यो भूयोऽपि नमः । द्विर्वचनमत्यादरार्थं मुण्डकसमाप्त्यर्थं च ॥ ११ ॥यहाँ ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । वह जिन ब्रह्मा आदिसे परम्परा-क्रमसे प्राप्त हुई है उन परमर्षियोंको नमस्कार है । जिन्होंने परब्रह्मका साक्षात् दर्शन किया है और उसका बोध प्राप्त किया है वे ब्रह्मा आदि परम ऋषि हैं; उन्हें फिर भी नमस्कार है । यहाँ 'नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः' यह द्विरुक्ति ऋषियोंके अधिक आदर और मुण्डककी समाप्तिके लिये है ॥११॥

इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये तृतीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥

समाप्तमिदं तृतीयं मुण्डकम् ।

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावाथर्वणमुण्डकोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥

शान्तिपाठः

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभि-
र्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

मन्त्रप्रतीक-सूची (परिशिष्ट)

श्रीहरिः

मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका

मन्त्रप्रतीकानिमुं०खं०मं०पृ०
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी५२
अतः समुद्रा गिरयश्च५९
अथर्वणे यां प्रवदेत
अरा इव रथनाभौ७०
अविद्यायामन्तरे३४
अविद्यायां बहुधा३५
आविः संनिहितम्६२
इष्टापूर्तं मन्यमानाः१०३५
ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः
एतस्माज्जायते प्राणः५०
एतेषु यश्चरते३०
एषोऽणुरात्मा चेतसा१००
एह्येहीति तमाहुतयः३१
कामान्यः कामयते१०४
क्रियावन्तः श्रोत्रियाः१०११७
काली कराली च२९
गताः कलाः पञ्चदश११३
तत्रापरा, ऋग्वेदः१२
तदेतत् सत्यमृषिः११११९
तदेतत् सत्यं मन्त्रेषु२४
तदेतत् सत्यं यथा४४

( २ )

मन्त्रप्रतीकानिमुं०खं०मं०पृ०
तपसा चीयते ब्रह्म१९
तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्ति११३६
तस्माच्च देवा बहुधा५६
तस्मादग्निः समिधः५४
तस्मादृचः साम यजूंषि५५
तस्मै स विद्वानुपसन्नाय१३४२
तस्मै स होवाच११
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः४६
द्वा सुपर्णा सयुजा८३
धनुर्गृहीत्वौपनिषदम्६६
न चक्षुषा गृह्यते९८
न तत्र सूर्यो भाति१०७८
नायमात्मा प्रवचनेन१०६
नायमात्मा बलहीनेन१०८
परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्१२३९
पुरुष एवेदं विश्वम्१०६०
प्लवा ह्येते अदृढा३२
प्रणवो धनुः शरः६७
प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैः८८
बृहच्च तद्दिव्यम्९६
ब्रह्मैवेदममृतम्११८०
भिद्यते हृदयग्रन्थिः७५
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यम्१५
यथा नद्यः स्यन्दमानाः११५
यथोर्णनाभिः सृजते१८
यदर्चिमद्यदणुभ्यः६४
यदा पश्यः पश्यते८७

( ३ )

मन्त्रप्रतीकानिमुं०खं०मं०पृ०
यदा लेलायते ह्यर्चिः२६
यं यं लोकं मनसा१०१०१
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य२१
,, ,,७२
यस्मिन्द्यौः पृथिवी६९
यस्याग्निहोत्रमदर्शम्२७
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः११०
शौनको ह वै महाशालः
सत्यमेव जयति९४
सत्येन लभ्यस्तपसा९२
सप्त प्राणाः प्रभवन्ति५७
समाने वृक्षे पुरुषः८५
स यो ह वै तत्परमम्११६
स वेदैतत्परमम्१०३
संप्राप्यैनमृषयः१०६
हिरण्मये परे कोशे७६