भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९


उपसंहार

तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥

उस इस सत्यका पूर्वकालमें अङ्गिरा ऋषिने [ शौनकजीको ] उपदेश किया था। जिसने शिरोव्रतका अनुष्ठान नहीं किया वह इसका अध्ययन नहीं कर सकता। परमर्षियोंको नमस्कार है, परमर्षियोंको नमस्कार है ॥ ११ ॥

तदेतदक्षरं पुरुषं सत्यमृषि-<br>रङ्गिरा नाम पुरा पूर्वं शौनकाय<br>विधिवदुपसन्नाय पृष्टवत उवाच ।<br>तद्वदन्योऽपि तथैव श्रेयोऽर्थिने<br>मुमुक्षवे मोक्षार्थं विधिवदुपसन्नाय<br>ब्रूयादित्यर्थः । नैतद्ग्रन्थरूपम्<br>अचीर्णव्रतोऽचरितव्रतोऽप्यधीते<br>न पठति । चीर्णव्रतस्य हि विद्या<br>फलाय संस्कृता भवतीति ।उस इस अक्षर पुरुष सत्यको अंगिरानामक ऋषिने पूर्वकालमें अपने समीप विधिपूर्वक आये हुए प्रश्नकर्ता शौनकजीसे कहा था। उनके समान अन्य किसी गुरुको भी उसी प्रकार अपने समीप विधिपूर्वक आये हुए कल्याणकामी मुमुक्षुपुरुषको उसके मोक्षके लिये इसका उपदेश करना चाहिये—यह इसका तात्पर्य है। इस ग्रन्थरूप उपदेशका 'अचीर्णव्रत' पुरुष—जिसने कि शिरोव्रतका आचरण न किया हो—अध्ययन नहीं कर सकता, क्योंकि जिसने उस व्रतका आचरण किया होता है उसीकी विद्या संस्कारसम्पन्न होकर फलवती होती है।