भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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११८मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

यही बात [आगेकी] ऋचाने भी कही है—जो अधिकारी क्रियावान् श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ और स्वयं श्रद्धापूर्वक एकर्षि नामक अग्निमें हवन करनेवाले हैं तथा जिन्होंने विधिपूर्वक शिरोव्रतका अनुष्ठान किया है उन्हींसे यह ब्रह्मविद्या कहनी चाहिये ॥ १० ॥

तदेतद्विद्यासम्प्रदानविधान-यह विद्यासम्प्रदानकी विधि
मृचा मन्त्रेणाभ्युक्तमभिप्रका-[आगेकी] ऋचा यानी मन्त्रने भी
शितम्—प्रकाशित की है—
क्रियावन्तो यथोक्तकर्मा-जो क्रियावान्—जैसा ऊपर
नुष्ठानयुक्ताः, श्रोत्रिया ब्रह्म-बतलाया गया है वैसे कर्मानुष्ठानमें
निष्ठा अपरस्मिन्ब्रह्मण्यभियुक्ताःलगे हुए, श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ
परब्रह्मबुभुत्सवः स्वयमेकर्षि-यानी अपरब्रह्ममें लगे हुए और
नामानमग्निं जुह्वते जुह्वति श्रद्द-परब्रह्मको जाननेके इच्छुक तथा
धन्तः श्रद्दधानाः सन्तो ये तेषाम्स्वयं श्रद्धायुक्त होकर एकर्षि नामक
एव संस्कृतात्मनां पात्रभूतानाम्अग्निमें हवन करनेवाले हैं उन्हीं
एतां ब्रह्मविद्यां वदेत ब्रूयात्शुद्धचित्त एवं ब्रह्मविद्याके पात्रभूत
शिरोव्रतं शिरस्यग्निधारणलक्षणम्,अधिकारियोंको यह ब्रह्मविद्या
यथाथर्वणानां वेदव्रतं प्रसिद्धम्,बतलानी चाहिये, जिन्होंने कि
यैस्तु यैश्च तच्चीर्णं विधिवद्यथा-शिरपर अग्नि धारण करनारूप
विधानं तेषामेव च ॥ १० ॥शिरोव्रतका—जैसा कि अथर्व-
वेदियोंका वेदव्रत प्रसिद्ध है—
विधिवत्—शास्त्रोक्त विधिके
अनुसार अनुष्ठान किया है, उन्हींसे
यह विद्या कहनी चाहिये ॥ १० ॥