भारतकोश
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मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

खंड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९३


यह आत्मा सर्वदा सत्य, तप, सम्यग्ज्ञान और ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जिसे दोषहीन योगिजन देखते हैं वह ज्योतिर्मय शुभ्र आत्मा शरीरके भीतर रहता है ॥ ५ ॥


सत्येनानृतत्यागेन मृषावदनत्यागेन लभ्यः प्राप्तव्यः । किं च तपसा हीन्द्रियमनैकाग्रतया "मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः" ( महा० शा० २५० । ४ ) इति स्मरणात् । तद्धह्यनुकूलमात्मदर्शनाभिमुखीभावात्परमं साधनं तपो नेतरच्चान्द्रायणादि । एष आत्मा लभ्य इत्यनुषङ्गः सर्वत्र । सम्यग्ज्ञानेन यथाभूतात्मदर्शनेन ब्रह्मचर्येण मैथुनासमाचारेण । नित्यं सत्येन नित्यं तपसा नित्यं सम्यग्ज्ञानेनेति सर्वत्र नित्यशब्दोऽन्तर्दीपिकान्यायेन अनुषक्तव्यः ।[ यह आत्मा ] सत्यसे अर्थात् अनृत यानी मिथ्या-भाषणके त्यागद्वारा प्राप्त किया जा सकता है । तथा "मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप है" इस स्मृतिके अनुसार तप यानी इन्द्रिय और मनकी एकाग्रतासे भी [ इस आत्माकी उपलब्धि हो सकती है], क्योंकि आत्मदर्शनके अभिमुख रहनेके कारण यही तप उसका अनुकूल परम साधन है—दूसरा चान्द्रायणादि तप उसका साधन नहीं है [ इसके सिवा ] सम्यग्ज्ञान—यथार्थ आत्मदर्शन और ब्रह्मचर्य—मैथुनके त्यागसे भी नित्य अर्थात् सर्वदा [ इस आत्माकी प्राप्ति हो सकती है]; यहाँ 'एष आत्मा लभ्यः' ( इस आत्माकी प्राप्ति हो सकती है) इस वाक्यका सर्वत्र सम्बन्ध है। 'सर्वदा सत्यसे', 'सर्वदा तपसे' और 'सर्वदा सम्यग्ज्ञानसे' इस प्रकार अन्तर्दीपिकान्यायसे ( मध्यवर्ती दीपकोंके समान ) सभीके साथ 'नित्य' शब्दका सम्बन्ध लगाना चाहिये;

९४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


वक्ष्यति च—"न येषु जिह्मम-जैसा कि आगे (प्रश्नोपनिषद्में)
नृतं न माया च" (प्र०कहेंगे भी *'जिन पुरुषोंमें अकुटिलता,
उ० १।१६) इति ।अनृत और माया नहीं है' इत्यादि ।
कोऽसावात्मा य एतैः साध-जो आत्मा इन साधनोंसे प्राप्त
नैर्लभ्य इत्युच्यते । अन्तःशरीरे-किया जाता है वह कौन है—
ऽन्तर्मध्ये शरीरस्य पुण्डरीकाकाशेइसपर कहा जाता है—'अन्तः-
ज्योतिर्मयो हि रुक्मवर्णः शुभ्रःशरीरे' अर्थात् शरीरके भीतर
शुद्धो यमात्मानं पश्यन्त्युपलभन्तेपुण्डरीकाकाशमें जो ज्योतिर्मय
यतयो यतनशीलाः संन्यासिनःसुवर्णवर्ण शुभ्र यानी शुद्ध आत्मा
क्षीणदोषाः क्षीणक्रोधादिचित्त-है, जिसे कि क्षीणदोष यानी
मलाः । स आत्मा नित्यं सत्या-जिनके क्रोधादि मनोमल क्षीण हो
दिसाधनैः संन्यासिभिर्लभ्यते ।गये हैं वे यतिजन—यत्नशील
न कादाचित्कैः सत्यादिभिःसंन्यासीलोग देखते अर्थात् उपलब्ध
लभ्यते । सत्यादिसाधनस्तु-करते हैं । तात्पर्य यह है कि वह
त्यर्थोऽयमर्थवादः ॥ ५ ॥आत्मा सर्वदा सत्यादि साधनोंसे ही
संन्यासियोंद्वारा प्राप्त किया जा
सकता है—कभी-कभी व्यवहार
किये जानेवाले सत्यादिसे प्राप्त नहीं
होता । यह अर्थवाद सत्यादि
साधनोंकी स्तुतिके लिये है ॥ ५ ॥

सत्यकी महिमा

सत्यमेव जयति नानृतं

सत्येन पन्था विततो देवयानः ।


* इस भविष्यत्कालिक उक्तिसे विदित होता है कि उपनिषद्भाष्यके विद्यार्थियोंको प्रश्नोपनिषद्के पश्चात् मुण्डकका अध्ययन करना चाहिये ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५


येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा

यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥

सत्य ही जयको प्राप्त होता है, मिथ्या नहीं । सत्यसे देवयान-मार्गका विस्तार होता है, जिसके द्वारा आप्तकाम ऋषिलोग उस पदको प्राप्त होते हैं जहाँ वह सत्यका परम निधान ( भण्डार ) वर्तमान है ॥६॥


मूल भाष्यभाष्यार्थ
सत्यमेव सत्यवानेव जयति नानृतं नानृतवादीत्यर्थः । न हि सत्यानृतयोः केवलयोः पुरुषानाश्रितयोर्जयः पराजयो वा सम्भवति । प्रसिद्धं लोके सत्यवादिनानृतवाद्यभिभूयते न विपर्ययोऽतः सिद्धं सत्यस्य बलवत्साधनत्वम् ।<br><br>किं च शास्त्रतोऽप्यवगम्यते सत्यस्य साधनातिशयत्वम् । कथम् ? सत्येन यथाभूतवादव्यवस्थया पन्था देवयानाख्यो विततो विस्तीर्णः सातत्येन प्रवृत्तः येन यथा ह्याक्रमन्ति क्रमन्त ऋषयो दर्शनवन्तः 'कुहकमाया-सत्य अर्थात् सत्यवान् ही जयको प्राप्त होता है, मिथ्या यानी मिथ्यावादी नहीं । [ यह ‘सत्य’ और ‘अनृत’ का सत्यवान् और मिथ्यावादी अर्थ इसलिये किया गया है कि ] पुरुषका आश्रय न करनेवाले केवल सत्य और मिथ्याका ही जय या पराजय नहीं हो सकता । लोकमें प्रसिद्ध ही है कि सत्यवादीसे मिथ्यावादीको ही नीचा देखना पड़ता है, इसके विपरीत नहीं होता । इससे सत्यका प्रवल साधनत्व सिद्ध होता है ।<br><br>यही नहीं, सत्यका उत्कृष्ट साधनत्व शास्त्रसे भी जाना जाता है । किस प्रकार ? [ सो बंतलाते हैं— ] सत्य अर्थात् यथार्थ वचनकी व्यवस्थासे देवयानसंज्ञक मार्ग विस्तीर्ण यानी नैरन्तर्यसे प्रवृत्त होता है, जिस मार्गसे कपट, छल, शठता, अहङ्कार, दम्भ और अनृतसे
९६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
शाठ्याहंकारदम्भानृतवर्जिता ह्याप्तकामा विगततृष्णाः सर्वतो यत्र यस्मिंस्तत्परमार्थतत्त्वं सत्यस्योत्तमसाधनस्य सम्बन्धि साध्यं परमं प्रकृष्टं निधानं पुरुषार्थरूपेण निधीयत इति निधानं वर्तते । तत्र च येन पथाक्रमन्ति स सत्येन वितत इति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ ६ ॥रहित तथा सब ओरसे पूर्णकाम और तृणारहित ऋषिगण—[अतीन्द्रिय वस्तुको] देखनेवाले पुरुष [उस पदपर] आरूढ होते हैं, जिसमें कि सत्यसंज्ञक उत्कृष्ट साधनका सम्बन्धी उसका साध्यरूप परमार्थतत्त्व जो पुरुषार्थरूपसे निहित होनेके कारण निधान है वह परम यानी प्रकृष्ट निधान वर्तमान है । 'उस पदमें जिस मार्गसे आरूढ होते हैं वह सत्यसे ही विस्तीर्ण हो रहा है'—इस प्रकार इसका पूर्व-वाक्यसे सम्बन्ध है ॥ ६ ॥

परमपदका स्वरूप

किं तत्किन्धर्मकं च तदित्युच्यते—वह क्या है और किन धर्मोंवाला है ? इसपर कहा जाता है—

बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं

सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं विभाति ।

दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च

पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥

वह महान् दिव्य और अचिन्त्यरूप है । वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर भासमान होता है तथा दूरसे भी दूर और इस शरीरमें अत्यन्त समीप भी है । वह चेतनावान् प्राणियोंमें इस शरीरके भीतर उनकी बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ है ॥ ७ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
बृहन्महच्च तत्प्रकृतं ब्रह्म सत्यादिसाधनं सर्वतो व्याप्तत्वात् । दिव्यं स्वयंप्रभमनिन्द्रियगोचरमत एव न चिन्तयितुं शक्यतेऽस्य रूपमित्यचिन्त्यरूपम् । सूक्ष्मादाकाशादेरपि तत्सूक्ष्मतरम्, निरतिशयं हि सौक्ष्म्यमस्य सर्वकारणत्वात्, विभाति विविधमादित्यचन्द्राद्याकारेण भाति दीप्यते ।सत्यादि जिसकी प्राप्तिके साधन हैं वह प्रकृत ब्रह्म सब ओर व्याप्त होनेके कारण बृहत्—महान् है । वह दिव्य—स्वयंप्रभ यानी इन्द्रियोंका अविषय है, इसलिये जिसका रूप चिन्तन न किया जा सके ऐसा अचिन्त्यरूप है । वह आकाशादि सूक्ष्म पदार्थोंसे भी सूक्ष्मतर है । सबका कारण होनेसे इसकी सूक्ष्मता सबसे अधिक है । इस प्रकार वह सूर्य-चन्द्र आदि रूपोंसे अनेक प्रकार भासित यानी दीप्त हो रहा है ।
किं च दूराद्विप्रकृष्टदेशात्सुदूरे विप्रकृष्टतरे देशे वर्ततेऽविदुषामत्यन्तागम्यत्वात्तद्ब्रह्म । इह देहेऽन्तिके समीपे च विदुषामात्मत्वात् । सर्वान्तरत्वाच्चाकाशास्याप्यन्तरश्रुतेः । इह पश्यत्सु चेतनावत्स्वित्येतन्निहितं स्थितं दर्शनादिक्रियावत्त्वेन योगिभिर्लक्ष्यमाणम् । क्व? गुहायांइसके सिवा वह ब्रह्म अज्ञानियोंके लिये अत्यन्त अगम्य होनेके कारण दूर यानी दूरस्थ देशसे भी अधिक दूर—अत्यन्त दूरस्थ देशमें वर्तमान है; तथा विद्वानोंका आत्मा होनेके कारण इस शरीरमें अत्यन्त समीप भी है । यह श्रुतिके कथनानुसार सबके भीतर रहनेवाला होनेसे आकाशके भीतर भी स्थित है । यह इस लोकमें 'पश्यत्सु' अर्थात् चेतनावान् प्राणियोंमें योगियोंद्वारा दर्शनादिक्रियावत्त्वरूपसे स्थित देखा जाता है । कहाँ देखा जाता है ?
९८मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
बुद्धिलक्षणायाम्। तत्र हि निगूढं लक्ष्यते विद्वद्भिः । तथाप्यविद्यया संवृतं सन्न लक्ष्यते तत्रस्थमेवाविद्वद्भिः ॥ ७ ॥उनकी बुद्धिरूप गुहामें । यह विद्वानोंको उसीमें छिपा हुआ दिखायी देता है । तो भी अविद्यासे आच्छादित रहनेके कारण यह अज्ञानियोंको वहाँ स्थित रहनेपर भी दिखायी नहीं देता ॥ ७ ॥

आत्मसाक्षात्कारका असाधारण साधन—चित्तशुद्धि

पुनरप्यसाधारणं तदुपलब्धिसाधनमुच्यते—फिर भी उसकी उपलब्धिका असाधारण साधन बतलाया जाता है—

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा
नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व-
स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ८ ॥

[ यह आत्मा ] न नेत्रसे ग्रहण किया जाता है, न वाणीसे, न अन्य इन्द्रियोंसे और न तप अथवा कर्मसे ही । ज्ञानके प्रसादसे पुरुष विशुद्धचित्त हो जाता है और तभी वह ध्यान करनेपर उस निष्कल आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करता है ॥ ८ ॥

यस्मान्न चक्षुषा गृह्यते केनचिदप्यरूपत्वान्नापि गृह्यते वाचानभिधेयत्वान्न चान्यैर्देवैरितरेन्द्रियैः । तपसः सर्वप्राप्तिसाधनत्वेऽपि न तपसाक्योंकि रूपहीन होनेके कारण यह आत्मा किसीसे भी नेत्रद्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता, अवाच्य होनेके कारण वाणीसे गृहीत नहीं होता और न अन्य इन्द्रियोंका ही विषय होता है। तप सभीकी प्राप्तिका साधन है; तथापि
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ९९
गृह्यते। तथा वैदिकेनाग्निहोत्रादि-कर्मणा प्रसिद्धमहत्त्वेनापि न गृह्यते । किं पुनरतस्य ग्रहणे साधनमित्याह—<br><br>ज्ञानप्रसादेन। आत्मावबोधनसमर्थमपि स्वभावेन सर्वप्राणिनां ज्ञानं बाह्यविषयरागादिदोषकलुषितमप्रसन्नमशुद्धं सन्नावबोधयति नित्यं संनिहितमप्यात्मतत्त्वं मलावनद्धमिवादर्शनम्, विल्लुलितमिव सलिलम्। तद्यदेन्द्रियविषयसंसर्गजनितरागादिमलकालुष्यापनयनादादर्शसलिलादिवत्प्रसादितं स्वच्छं शान्तमवतिष्ठते तदा ज्ञानस्य प्रसादः स्यात् ।<br><br> तेन ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वो विशुद्धान्तःकरणो योग्यो ब्रह्म द्रष्टुं यस्मात्ततस्तस्मात्तु तमात्मानं पश्यते पश्यत्युपलभतेयह तपसे भी ग्रहण नहीं किया जाता और न जिसका महत्त्व सुप्रसिद्ध है उस अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मसे ही गृहीत होता है। तो फिर उसके ग्रहण करनेमें क्या साधन है ? इसपर कहते हैं—<br><br> ज्ञान (ज्ञानकी साधनभूता बुद्धि) के प्रसादसे [उसका ग्रहण हो सकता है]। सम्पूर्ण प्राणियोंका ज्ञान स्वभावसे आत्मबोध करानेमें समर्थ होनेपर भी, बाह्य विषयोंके रागादि दोषसे कलुषित—अप्रसन्न यानी अशुद्ध हो जानेके कारण उस आत्मतत्त्वका, सर्वदा समीपस्थ होनेपर भी, मलसे ढके हुए दर्पण तथा चञ्चल जलके समान बोध नहीं करा सकता। जिस समय इन्द्रिय और विषयोंके संसर्गसे होनेवाले रागादि दोषरूप मलके दूर हो जानेपर दर्पण या जल आदिके समान चित्त प्रसन्न—स्वच्छ अर्थात् शान्तभावसे स्थित हो जाता है उस समय ज्ञानका प्रसाद होता है।<br><br> क्योंकि उस ज्ञानप्रसादसे विशुद्धसत्त्व यानी शुद्धचित्त हुआ पुरुष ब्रह्मका साक्षात्कार करने योग्य होता है इसलिये तब वह ध्यान करके अर्थात् सत्यादि साधनसम्पन्न
१००मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

निष्कलँ सर्वावयवभेदवर्जितंहोकर इन्द्रियोंका निरोध कर एकाग्रचित्तसे ध्यान—चिन्तन करता हुआ उस निष्कल यानी सम्पूर्ण अवयवभेदसे रहित आत्माको देखता—उपलब्ध करता है ॥८॥
ध्यायमानः सत्यादिसाधन-
वानुपसंहृतकरण एकाग्रेण मनसा
ध्यायमानश्चिन्तयन् ॥ ८ ॥

शरीरमें इन्द्रियरूपसे अनुप्रविष्ट हुए आत्माका चित्तशुद्धिद्वारा साक्षात्कार

यमात्मानमेवं पश्यति—जिस आत्माको साधक इस प्रकार देखता है—

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो
यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश ।
प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां
यस्मिन्विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ९ ॥

वह सूक्ष्म आत्मा, जिस [शरीर] में पाँच प्रकारसे प्राण प्रविष्ट है उस शरीरके भीतर ही विशुद्ध विज्ञानद्वारा जानने योग्य है। उसने इन्द्रियोंद्वारा प्रजावर्गके सम्पूर्ण चित्तोंको व्याप्त किया हुआ है, जिसके शुद्ध हो जानेपर यह आत्मस्वरूपसे प्रकाशित होने लगता है ॥ ९ ॥

एषोऽणुः सूक्ष्मश्चेतसा विशुद्धज्ञानेन केवलेन वेदितव्यः। क्वासौ ? यस्मिञ्शरीरे प्राणो वायुः पञ्चधा प्राणापानादिभेदेन संविवेश सम्यक्प्रविष्टस्तस्मिन्नेव शरीरे हृदये चेतसा ज्ञेय इत्यर्थः ।वह अणु—सूक्ष्म आत्मा चित्त यानी केवल विशुद्ध ज्ञानसे जानने योग्य है। वह कहाँ जानने योग्य है ? जिस शरीरमें प्राणवायु, प्राण-अपान आदि भेदसे पाँच प्रकारका होकर सम्यक् रीतिसे प्रविष्ट हो रहा है उसी शरीरमें हृदयके भीतर यह चित्तद्वारा जानने योग्य है—ऐसा इसका तात्पर्य है।
खण्ड १ ]शाङ्करभाष्यार्थ१०१

कीदृशेन चेतसा वेदितव्य इत्याह—प्राणैः सहेन्द्रियैश्चित्तं सर्वमन्तःकरणं प्रजानामोतं व्याप्तं येन क्षीरमिव स्नेहेन काष्ठमिवाग्निना । सर्वं हि प्रजानामन्तःकरणं चेतनावत्प्रसिद्धं लोके । यस्मिश्च चित्ते क्लेशादिमलवियुक्ते शुद्धे विभवत्येष उक्त आत्मा विशेषेण स्वेनात्मना विभवत्यात्मानं प्रकाशयतीत्यर्थः ॥ ९ ॥वह किस प्रकारके चित्त (ज्ञान) से ज्ञातव्य है ? इसपर कहते हैं—दूध जिस प्रकार घृतसे और काष्ठ जिस प्रकार अग्निसे व्याप्त है उसी प्रकार जिससे प्राण यानी इन्द्रियोंके सहित प्रजाके समस्त चित्त—अन्तःकरण व्याप्त हैं, क्योंकि लोकमें प्रजाके सभी अन्तःकरण चेतनायुक्त प्रसिद्ध हैं और जिस चित्तके शुद्ध यानी क्लेशादि मलसे वियुक्त होनेपर यह पूर्वोक्त आत्मा अपने विशेषरूपसे प्रकट होता है अर्थात् अपनेको प्रकाशित कर देता है [उस विशुद्ध और विभु विज्ञानसे ही उस आत्मतत्त्वका अनुभव किया जा सकता है] ॥९॥

आत्मज्ञका वैभव और उसकी पूजाका विधान

य एवमुक्तलक्षणं सर्वात्मानमात्मत्वेन प्रतिपन्नस्तस्य सर्वात्मत्वादेव सर्वावाप्तिलक्षणं फलमाह—इस प्रकार जो उपर्युक्त सर्वात्माको आत्मस्वरूपसे जानता है उसका सर्वात्मा होनेसे ही सर्वप्राप्तिरूप फल बतलाते हैं—

यं यं लोकं मनसा संविभाति
विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् ।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामां-
स्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥ १० ॥

१०२मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

वह विशुद्धचित्त आत्मवेत्ता मनसे जिस-जिस लोककी भावना करता है और जिन-जिन भोगोंको चाहता है वह उसी-उसी लोक और उन्हीं-उन्हीं भोगोंको प्राप्त कर लेता है। इसलिये ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाला पुरुष आत्मज्ञानीकी पूजा करे ॥ १० ॥

यं यं लोकं पित्रादिलक्षणं मनसा संविभाति संकल्पयति मह्यमन्यस्मै वा भवेदिति विशुद्धसत्त्वः क्षीणक्लेश आत्मविन्निर्मलान्तःकरणः कामयते यांश्च कामान्प्रार्थयते भोगांस्तं तं लोकं जयते प्राप्नोति तांश्च कामान्संकल्पितान्भोगान् । तस्माद्विद्वुषः सत्यसंकल्पत्वादात्मज्ञमात्मज्ञानेन विशुद्धान्तःकरणं ह्यर्चयेत् पूजयेत्पादप्रक्षालनशुश्रूषानमस्कारादिभिर्भूतिकामो विभूतिमिच्छुः। ततः पूजार्ह एवासौ।१०।विशुद्धसत्त्व—जिसके क्लेश* क्षीण हो गये हैं वह निर्मलचित्त आत्मवेत्ता जिस पितृलोक आदि लोककी मनसे इच्छा करता है अर्थात् ऐसा सङ्कल्प करता है कि मुझे या किसी अन्यको अमुक लोक प्राप्त हो अथवा वह जिन कामना यानी भोगोंकी अभिलाषा करता है उसी-उसी लोक तथा अपने सङ्कल्प किये हुए उन्हीं-उन्हीं भोगोंको वह प्राप्त कर लेता है। अतः ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाला पुरुष उस विशुद्धचित्त आत्मज्ञानीका पाद-प्रक्षालन, शुश्रूषा एवं नमस्कारादिद्वारा पूजन करे, क्योंकि विद्वान् सत्यसङ्कल्प होता है। इसलिये (सत्यसङ्कल्प होनेके कारण) वह पूजनीय ही है ॥१०॥

इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये तृतीयमुण्डके
प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥


* क्लेश मनोविकारोंको कहा है। वे पाँच हैं; यथा—
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः । (योग० २ । ३)
१ अविद्या, २ अस्मिता, ३ राग, ४ द्वेष और ५ अभिनिवेश—ये क्लेश हैं।

तृतीय मुण्डक (द्वितीय खण्ड) - ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मैव भवति

द्वितीय खण्ड

आत्मवेत्ताकी पूजाका फल

यस्मात्—क्योंकि—

स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम
यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ।
उपासते पुरुषं ये ह्यकामा-
स्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥

वह (आत्मवेत्ता) इस परम आश्रयरूप ब्रह्मको, जिसमें यह समस्त जगत् अर्पित है और जो स्वयं शुद्धरूपसे भासमान हो रहा है, जानता है। जो निष्काम भावसे उस आत्मज्ञ पुरुषकी उपासना करते हैं वे बुद्धिमान्लोग शरीरके बीजभूत इस वीर्यका अतिक्रमण कर जाते हैं। [अर्थात् इसके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं] ॥ १ ॥

स वेद जानातीत्येतद्यथोक्तलक्षणं ब्रह्म परममुत्कृष्टं धाम सर्वकामानामाश्रयमास्पदं यत्र यस्मिन् ब्रह्मणि धाम्नि विश्वं समस्तं जगन्निहितमर्पितं यच्च स्वेन ज्योतिषा भाति शुभ्रं शुद्धम् । तमप्येवमात्मज्ञं पुरुषं ये ह्यकामा विभूतितृष्णावर्जिता मुमुक्षवःवह (आत्मवेत्ता) सम्पूर्ण कामनाओंके परम यानी उत्कृष्ट आश्रयभूत इस पूर्वोक्त लक्षणवाले ब्रह्मको जानता है, जिस ब्रह्मपदमें यह विश्व यानी सम्पूर्ण जगत् निहित—समर्पित है और जो कि अपने तेजसे—शुद्धरूपसे प्रकाशित हो रहा है। उस इस प्रकारके आत्मज्ञ पुरुषकी भी जो लोग निष्काम अर्थात् ऐश्वर्यकी तृष्णासे रहित होकर यानी मुमुक्षु होकर परमदेवके,

१०४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


सन्त उपासते परमिव सेवन्ते ते शुक्रंन्नृबीजं यदेतत्प्रसिद्धं शरीरोपादानकारणमतिवर्तन्त्यतिगच्छन्ति धीरा धीमन्तो न पुनर्योनिं प्रसर्पन्ति “न पुनः कचिद्रतिं करोति” इति श्रुतेः। अतस्तं पूजयेदित्यभिप्रायः॥१॥समान उपासना करते हैं वे धीर—बुद्धिमान् पुरुष शुक्र यानी मनुष्यदेहके बीजको, जो कि शरीरके उपादान कारणरूपसे प्रसिद्ध है, अतिक्रमण कर जाते हैं; अर्थात् फिर योनिमें प्रवेश नहीं करते, जैसा कि “फिर कहीं प्रीति नहीं करता” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः तात्पर्य यह है कि उसका पूजन करना चाहिये ॥१॥

निष्कामतासे पुनर्जन्मनिवृत्ति

मुमुक्षोः कामत्याग एव प्रधानं साधनमित्येतद्दर्शयति—मुमुक्षुके लिये कामनाका त्याग ही प्रधान साधन है—इस बातको दिखलाते हैं—

कामान्यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र । पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्त्वि- हैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥

[ भोगोंके गुणोंका ] चिन्तन करनेवाला जो पुरुष भोगोंकी इच्छा करता है वह उन कामनाओंके योगसे वहाँ-वहाँ (उनकी प्राप्तिके स्थानोंमें) उत्पन्न होता रहता है। परन्तु जिसकी कामनाएँ पूर्ण हो गयी हैं उस कृतकृत्य पुरुषकी तो सभी कामनाएँ इस लोकमें ही लीन हो जाती हैं ॥ २ ॥

कामान्यो दृष्टादृष्टविषयान् कामयते मन्यमानस्तद्गुणांश्चि-जो पुरुष काम अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट अभीष्ट विषयोंकी, उनके गुणोंका मनन—चिन्तन करता

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५


न्त्यानः प्रार्थयते स तैः कामभिः कामैर्धर्माधर्मप्रवृत्तिहेतुभिर्विषयेच्छारूपैः सह जायते तत्र तत्र । यत्र यत्र विषयप्राप्तिनिमित्तं कामाः कर्मसु पुरुषं नियोजयन्ति तत्र तत्र तेषु तेषु विषयेषु तैरेव कामैर्वेष्टितो जायते ।<br><br>यस्तु परमार्थतत्त्वविज्ञानात् पर्याप्तकाम आत्मकामत्वेन परिसमन्तत आप्ताः कामा यस्य तस्य पर्याप्तकामस्य कृतात्मनोऽविद्यालक्षणादपररूपादपनीय स्वेन परेण रूपेण कृत आत्मा विद्यया यस्य तस्य कृतात्मनस्त्विहैव तिष्ठत्येव शरीरे सर्वे धर्माधर्मप्रवृत्तिहेतवः प्रविलीयन्ति विलयम् उपयान्ति नश्यन्तीत्यर्थः । कामास्तज्जन्महेतुविनाशान्न जायन्त इत्यभिप्रायः ॥ २ ॥हुआ, कामना करता है वह उन कामनाओं अर्थात् धर्माधर्ममें प्रवृत्ति करानेके हेतुभूत विषयोंकी इच्छारूप वासनाओंके सहित वहीं-वहीं उत्पन्न होता है; अर्थात् जहाँ-जहाँ विषयप्राप्तिके लिये कामनाएँ पुरुषको कर्ममें नियुक्त करती हैं वह वहीं-वहीं उन्हीं-उन्हीं प्रदेशोंमें उन कामनाओंसे ही परिवेष्टित हुआ जन्म ग्रहण करता है ।<br><br>परन्तु जो परमार्थतत्त्वके विज्ञानसे पूर्णकाम हो गया है, अर्थात् आत्मप्राप्तिकी इच्छावाला होनेके कारण जिसे सब ओरसे समस्त भोग प्राप्त हो चुके हैं उस पूर्णकाम कृतकृत्य पुरुषकी सभी कामनाएँ [लीन हो जाती हैं] अर्थात् जिसने विद्याद्वारा अपने आत्माको उसके अविद्यामय अपररूपसे हटाकर अपने पररूपसे स्थित कर दिया है उस कृतात्माके धर्माधर्मकी प्रवृत्तिके समस्त हेतु इस शरीरमें स्थित रहते हुए ही लीन अर्थात् नष्ट हो जाते हैं । अभिप्राय यह है कि अपनी उत्पत्तिके हेतुका नाश हो जानेके कारण उसमें फिर कामनाएँ उत्पन्न नहीं होतीं ॥ २ ॥
१०६मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३

आत्मदर्शनका प्रधान साधन—जिज्ञासा

यद्येवं सर्वलाभात्परम आत्म-इस प्रकार यदि और सब
लाभोंकी अपेक्षा आत्मलाभ ही
लाभस्तल्लाभाय प्रवचनादयउत्कृष्ट है तो उसकी प्राप्तिके लिये
प्रवचन आदि उपाय अधिकतासे
उपाया बाहुल्येन कर्तव्या इतिकरने चाहिये—ऐसी बात प्राप्त
प्राप्त इदमुच्यते—होनेपर यह कहा जाता है—

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ ३ ॥

यह आत्मा न तो प्रवचन (पुष्कल शास्त्राध्ययन) से प्राप्त होने योग्य है और न मेधा (धारणाशक्ति) अथवा अधिक श्रवण करनेसे ही मिलनेवाला है। यह (विद्वान्) जिस परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छा करता है उस (इच्छा) के द्वारा ही इसकी प्राप्ति हो सकती है। उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूपको व्यक्त कर देता है ॥ ३ ॥

योऽयमात्मा व्याख्यातोजिस इस आत्माकी व्याख्या
की गयी है, जिसका लाभ ही परम
यस्य लाभः परः पुरुषार्थो नासौपुरुषार्थ है वह वेदशास्त्रके अधिक
वेदशास्त्राध्ययनबाहुल्येन प्रवच-अध्ययनरूप प्रवचनसे प्राप्त होने
नेन लभ्यः। तथा न मेधयायोग्य नहीं है। इसी प्रकार वह
मेधा—ग्रन्थके अर्थको धारण
ग्रन्थार्थधारणशक्त्या। न बहुनाकरनेकी शक्ति अथवा 'बहुना
श्रुतेन नापि भूयसा श्रवणे-श्रुतेन' यानी अधिक शास्त्रश्रवणसे
नेत्यर्थः।ही मिल सकता है।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७


केन तर्हि लभ्य इत्युच्यते—यमेव परमात्मानमेवैष विद्वान्वृणुते प्राप्तुमिच्छति तेन वरणेनैष परमात्मा लभ्यो नान्येन साधनान्तरेण । नित्यलब्धस्वभावत्वात् ।तो फिर वह किस उपायसे प्राप्त हो सकता है ? इसपर कहते हैं—जिस परमात्माको यह विद्वान् वरण करता अर्थात् प्राप्त करनेकी इच्छा करता है उस वरण करनेके द्वारा ही यह परमात्मा प्राप्त होने योग्य है; नित्यप्राप्तस्वरूप होनेके कारण किसी अन्य साधनसे प्राप्त नहीं हो सकता ।
कीदृशोऽसौ विदुष आत्मलाभ इत्युच्यते । तस्यैष आत्माविद्यासञ्छन्नां स्वां परां तनुं स्वात्मतत्त्वं स्वरूपं विवृणुते प्रकाशयति प्रकाश इव घटादिविद्यायां सत्यामाविर्भवतीत्यर्थः । तस्मादन्यत्यागेनात्मलाभप्रार्थनैवात्मलाभसाधनमित्यर्थः ॥३॥विद्वान्को होनेवाला यह आत्मलाभ कैसा होता है—इसपर कहते हैं—यह आत्मा उसके प्रति अपने अविद्याच्छन्न परस्वरूपको यानी स्वात्मतत्त्वको प्रकाशित कर देता है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार प्रकाशमें घटादिकी अभिव्यक्ति होती है उसी प्रकार विद्याकी प्राप्ति होनेपर आत्माका आविर्भाव हो जाता है। अतः तात्पर्य यह है कि अन्य कामनाओंके त्यागद्वारा आत्मप्रार्थना ही आत्मलाभका साधन है ॥ ३ ॥

आत्मदर्शनके अन्य साधन

आत्मप्रार्थनासहायभूतान्येतानि च साधनानि बलाप्रमादतपांसि लिङ्गयुक्तानि संन्याससहितानि । यस्मात्—लिङ्गयुक्त अर्थात् संन्यासकें सहित बल, अप्रमाद और तप—, ये सब साधन आत्मप्रार्थनाके सहायक हैं । क्योंकि—

१०८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो

न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् ।

एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वां-

स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥

यह आत्मा बलहीन पुरुषको प्राप्त नहीं हो सकता और न प्रमाद अथवा लिङ्ग (संन्यास) रहित तपस्यासे ही [मिल सकता है]। परंतु जो विद्वान् इन उपायोंसे [उसे प्राप्त करनेके लिये] प्रयत्न करता है उसे यह आत्मा ब्रह्मधाममें प्रवेश करा देता है ॥ ४ ॥


यस्मादयमात्मा बलहीनेन बलप्रहीणेनात्मनिष्ठाजनितवीर्यहीनेन न लभ्यो नापि लौकिकपुत्रपश्वादिविषयसङ्गनिमित्तप्रमादात् , तथा तपसो वाप्यलिङ्गाल्लिङ्गरहितात् । तपोऽत्र ज्ञानम्; लिङ्गं संन्यासः। संन्यासरहिताज्ज्ञानान्न लभ्यत इत्यर्थः । एतैरुपायैर्बलाप्रमादसंन्यासज्ञानैर्यतते तत्परः संन्प्रयतते यस्तु विद्वान्विवेक्यात्मवित्तस्य विदुष एष आत्मा विशते संप्रविशति ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥यह आत्मा बलहीन अर्थात् आत्मनिष्ठाजनित शक्तिसे रहित पुरुषद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है; न लौकिक पुत्र एवं पशु आदि विषयोंकी आसक्तिके कारण होनेवाले प्रमादसे ही मिल सकता है और न लिङ्गरहित तपस्यासे ही । यहाँ तप ज्ञान है और लिङ्ग संन्यास । तात्पर्य यह कि संन्यासरहित ज्ञानसे प्राप्त नहीं होता । जो विद्वान् यानी विवेकी आत्मवेत्ता तत्पर होकर बल, अप्रमाद, संन्यास और ज्ञान—इन उपायोंसे [उसकी प्राप्तिके लिये] प्रयत्न करता है उस विद्वान्का यह आत्मा ब्रह्मधाममें सम्यक् रूपसे प्रविष्ट हो जाता है ॥४॥

खण्ड २ ] • शाङ्करभाष्यार्थ १०९


आत्मदर्शीकी ब्रह्मप्राप्तिका प्रकार

कथं ब्रह्म संविशत इत्युच्यते—विद्वान् किस प्रकार ब्रह्ममें प्रविष्ट होता है सो बतलाया जाता है—

संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः

कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः ।

ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा

युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥

इस आत्माको प्राप्तकर ऋषिगण ज्ञानतृप्त, कृतकृत्य, विरक्त और प्रशान्त हो जाते हैं। वे धीर पुरुष उस सर्वगत ब्रह्मको सब ओर प्राप्त कर [ मरणकालमें ] समाहितचित्त हो सर्वरूप ब्रह्ममें ही प्रवेश कर जाते हैं ॥ ५ ॥

| संप्राप्य समवगम्यैनमात्मा- | इस आत्माको सम्यक् प्रकारसे | | नमृषयो दर्शनवन्तस्तेनैव ज्ञानेन | प्राप्तकर—जानकर ऋषि अर्थात् | | तृप्ता न बाह्येन तृप्ति- | आत्मदर्शनवान् लोग, शरीरको पुष्ट | | साधनेन शरीरोपचयकारणेन | करनेवाले किसी बाह्य तृप्तिसाधनसे | | कृतात्मानः परमात्मस्वरूपेणैव | नहीं बल्कि उस ज्ञानसे ही तृप्त | | निष्पन्नात्मानः सन्तो वीतरागाः | हो कृतात्मा—जिनका आत्मा | | वीतरागादिदोषाः प्रशान्ता | परमात्मस्वरूपसे ही निष्पन्न हो गया | | उपरतेन्द्रियाः । | है ऐसे होकर तथा वीतराग— | | त एवंभूताः सर्वगं सर्वव्या- | रागादि दोषोंसे रहित और प्रशान्त | | पिनमाकाशवत्सर्वतः सर्वत्र प्राप्य | यानी उपरतेन्द्रिय हो जाते हैं। | | —नोपाधिपरिच्छिन्नेनैकदेशेन, | ऐसे भावको प्राप्त हुए वे लोग | | | सर्वग—आकाशके समान सर्व- | | | व्यापक ब्रह्मको, उपाधिपरिच्छिन्न | | | एक देशमें नहीं, बल्कि सर्वत्र |

.११०मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३
किं तर्हि? तद्ब्रह्मैवाद्वयमात्मत्वेन प्रतिपद्य धीरा अत्यन्तविवेकिनो युक्तात्मानो नित्यसमाहितस्वभावाः सर्वमेव समस्तं शरीरपातकालेऽप्याविशन्ति भिन्ने घटे घटाकाशवदविद्याकृतोपाधिपरिच्छेदं जहति । एवं ब्रह्मविदो ब्रह्मधाम प्रविशन्ति ॥ ५ ॥प्राप्त कर—फिर क्या होता है ? उस अद्वयब्रह्मको ही आत्मभावसे अनुभव कर, वे धीर यानी अत्यन्त विवेकी और युक्तात्मा—नित्य समाहितस्वभाव पुरुष शरीरपातके समय भी सर्वरूप ब्रह्ममें ही प्रवेश कर जाते हैं; अर्थात् घटके फूट जानेपर घटाकाशके समान वे अपने अविद्याजनित परिच्छेदका परित्याग कर देते हैं। इस प्रकार वे ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मधाममें प्रवेश करते हैं ॥ ५ ॥

ज्ञातज्ञेयकी मोक्षप्राप्ति

किं च—तथा—

वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः

संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः ।

ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले

परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥

जिन्होंने वेदान्तजनित विज्ञानसे ज्ञेय अर्थका अच्छी तरह निश्चय कर लिया है वे संन्यासयोगसे यत्न करनेवाले समस्त शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोकमें देह त्याग करते समय परम अमरभावको प्राप्त हो सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥

वेदान्तजनितविज्ञानं वेदान्तविज्ञानं तस्यार्थः परमात्मावेदान्तसे उत्पन्न होनेवाला विज्ञान वेदान्तविज्ञान कहलाता है। उसका अर्थ यानी विज्ञेय परमात्मा
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ१११
विज्ञेयः सोऽर्थः सुनिश्चितो येषांहै। वह अर्थ जिन्हें अच्छी तरह
ते वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः।निश्चित हो गया है वे 'वेदान्त-
ते च संन्यासयोगात्सर्वकर्मपरि-विज्ञानसुनिश्चितार्थ' कहलाते हैं।
त्यागलक्षणयोगात्केवलब्रह्मनिष्ठा-वे संन्यासयोगसे—सर्वकर्मपरित्याग-
स्वरूपाद्योगाद्यतयो यतनशीलाःरूप योगसे अर्थात् केवल ब्रह्मनिष्ठा-
शुद्धसत्त्वाः शुद्धं सत्त्वं येषांस्वरूप योगसे यत्न करनेवाले और
संन्यासयोगात्ते शुद्धसत्त्वाः । तेशुद्धसत्त्व—संन्यासयोगसे जिनका
ब्रह्मलोकेषु—संसारिणां ये मरण-सत्त्व (चित्त) शुद्ध हो गया है ऐसे वे
कालास्तेऽपरान्तास्तानपेक्ष्य मुमु-शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोकोंमें परामृत—
क्षूणां संसारावसाने देहपरित्याग-परम अमृत यानी अमरणधर्मा ब्रह्म
कालः परान्तकालस्तस्मिन्परा-ही जिनका आत्मस्वरूप हैं ऐसे
न्तकाले साधकानां बहुत्वान्ब्रह्मैवजीवित अवस्थामें ही परामृत यानी
लोको ब्रह्मलोक एकोऽप्यनेकवद्ब्रह्मभूत होकर दीपनिर्वाण अथवा
दृश्यते प्राप्यते वा, अतो बहुवचनं[घटके फूटनेपर] घटाकाशके समान
ब्रह्मलोकेष्विति ब्रह्मणीत्यर्थः—परिमुक्त यानी निवृत्तिको प्राप्त हो
परामृताः परममृतममरणधर्मकंजाते हैं। वे सब परि अर्थात्
ब्रह्मात्मभूतं येषां ते परा-सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं।
मृता जीवन्त एव ब्रह्मभूताःकिसी अन्य गन्तव्य देशान्तरकी
परामृताः सन्तः परिमुच्यन्ति परिअपेक्षा नहीं करते। संसारी पुरुषों-
समन्तात्प्रदीपनिर्वाणवद् घटा-के जो अन्तकाल होते हैं वे
'अपरान्तकाल' हैं उनकी अपेक्षा
मुमुक्षुओंके संसारका अन्त हो
जानेपर उनका जो देहपरित्याग-
का समय है वह 'परान्तकाल' है।
उस परान्तकालमें वे ब्रह्मलोकोंमें—
बहुत-से साधक होनेके कारण यहाँ
११२मुण्डकोपनिषद्[ मुण्डक ३ :
काशवन्निवृत्तिमुपयान्ति । परिमुच्यन्ति परिसमन्तान्मुच्यन्ते सर्वे न देशान्तरं गन्तव्यम् अपेक्षन्ते ।<br><br>“शकुनीनामिवाकाशे जले वारिचरस्य च । पदं यथा न दृश्येत तथा ज्ञानवतां गतिः”<br>(महा० शा० २३९ । २४) ।<br><br>“अनध्वगा अध्वसु पारयिष्णवः” इति श्रुतिस्मृतिभ्यः ।<br><br>देशपरिच्छिन्ना हि गतिः संसारविषयैव परिच्छिन्नसाधनसाध्यत्वात् । ब्रह्म तु समस्तत्वान्न देशपरिच्छेदेन गन्तव्यम् । यदि हि देशपरिच्छिन्नं ब्रह्म स्यान्मूर्तद्रव्यवदाद्यन्तवदन्याश्रितं सावयवम् अनित्यं कृतकं च स्यात् । न त्वेवंविधं ब्रह्म भवितुमर्हति । अतस्तत्प्राप्तिश्च नैव देशपरिच्छिन्ना भवितुं युक्ता । अपि चाविद्यादि-ब्रह्मलोक यानी ब्रह्मस्वरूप लोक एक होनेपर भी अनेकवत् देखा और प्राप्त किया जाता है । इसीलिये ‘ब्रह्मलोकेषु’ इस पदमें बहुवचनका प्रयोग हुआ है, अतः ‘ब्रह्मलोकेषु’का अर्थ है ब्रह्ममें ।<br><br>“जिस प्रकार आकाशमें पक्षियोंके और जलमें जलचर जीवके पैर (चरणचिह्न) दिखायी नहीं देते उसी प्रकार ज्ञानियोंकी गति नहीं जानी जाती”<br>“[मुमुक्षुलोग] संसारमार्गसे पार होनेकी इच्छासे अनध्वग (संसारमार्गमें विचरण न करनेवाले) होते हैं ।” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे भी यही प्रमाणित होता है ।<br><br>परिच्छिन्न साधनसे साध्य होनेके कारण संसारसम्बन्धिनी गति देशपरिच्छिन्ना ही होती है । किन्तु ब्रह्म सर्वरूप होनेके कारण किसी देशपरिच्छेदसे प्राप्तव्य नहीं है । यदि ब्रह्म देशपरिच्छिन्न हो तो मूर्तद्रव्यके समान आदि-अन्तवान्, पराश्रित, सावयव, अनित्य और कृतक सिद्ध हो जायगा । किन्तु ब्रह्म ऐसा हो नहीं सकता । अतः उसकी प्राप्ति भी देशपरिच्छिन्ना नहीं हो सकती; इसके सिवा ब्रह्मवेत्ता लोग अविद्यादि-संसार-