भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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७६ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २


फलानि ज्ञानोत्पत्तिसहभावीनि<br>च क्षीयन्ते कर्माणि । न त्वेत-<br>ज्जन्मारम्भकाणि प्रवृत्तफलत्वात् ।<br>तस्मिन्सर्वज्ञेऽसंसारिणि परावरे<br>परं च कारणात्मनावरं च<br>कार्यात्मना तस्मिन्परावरे साक्षा-<br>दहमस्मीति दृष्टे संसारकारणो-<br>च्छेदान्मुच्यत इत्यर्थः ॥ ८ ॥हैं और जो ज्ञानोत्पत्ति के साथ-<br>साथ किये जाते हैं वे सभी नष्ट हो<br>जाते हैं; किन्तु इस ( वर्तमान )<br>जन्मको आरम्भ करनेवाले कर्म<br>क्षीण नहीं होते, क्योंकि उनका<br>फल देना आरम्भ हो जाता है ।<br>तात्पर्य यह है कि उस सर्वज्ञ<br>असंसारी परावर—कारणरूपसे<br>पर और कार्यरूपसे अपर ऐसे उस<br>परावरके 'यह साक्षात् मैं ही हूँ' इस<br>प्रकार देख लिये जानेपर संसारके<br>कारणका उच्छेद हो जानेसे यह<br>पुरुष मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥

उक्तस्यैवार्थस्य सङ्क्षेपाभि-<br>धायका उत्तरे मन्त्रास्त्रयोऽपि—आगेके तीन मन्त्र भी पूर्वोक्त<br>अर्थको ही संक्षेपसे बतलाने-<br>वाले हैं—

ज्योतिर्मय ब्रह्म

हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् ।
यच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ ९ ॥

वह निर्मल और कलाहीन ब्रह्म हिरण्मय ( ज्योतिर्मय ) परम कोशमें विद्यमान है । वह शुद्ध और सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थोंकी ज्योति है और वह है जिसे कि आत्मज्ञानी पुरुष जानते हैं ॥ ९ ॥