भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७


हिरण्मये ज्योतिर्मये बुद्धि-विज्ञानप्रकाशे परे कोशे कोश इवासेः, आत्मस्वरूपोपलब्धिस्थानत्वात्; परं तत्सर्वाभ्यन्तरत्वात् तस्मिन् विरजमविद्याद्यशेषदोषरजोमलवर्जितं ब्रह्म सर्वमहत्त्वात् सर्वात्मत्वाच्च । निष्कलं निर्गताः कला यस्मात्तन्निष्कलं निरवयवम् इत्यर्थः ।हिरण्मय—ज्योतिर्मय अर्थात् बुद्धिवृत्तिके प्रकाशरूप परमकोशमें, जो आत्मस्वरूपकी उपलब्धिको स्थान होनेके कारण तलवारके कोश (म्यान) के समान है और सबसे भीतरी होनेके कारण श्रेष्ठ है, उसमें विरज—अविद्यादि सम्पूर्ण दोषरूप मलसे रहित ब्रह्म विराजमान है, जो सबसे बड़ा तथा सर्वरूप होनेके कारण ब्रह्म है। वह निष्कल है; जिससे सब कलाएँ निकल गयी हों उसे निष्कल कहते हैं अर्थात् वह निरवयव है ।
यस्माद्विरजं निष्कलं चातस्तच्छुभ्रं शुद्धं ज्योतिषां सर्वप्रकाशात्मनामग्न्यादीनामपि तज्ज्योतिरवभासकम् । अग्न्यादीनाम् अपि ज्योतिष्टमन्तर्गतब्रह्मात्मचैतन्यज्योतिर्निमित्तमित्यर्थः । तद्धि परं ज्योतिर्यदन्यानवभास्यम् आत्मज्योतिस्तद्यदात्मविद आत्मानं स्वं शब्दादिविषयबुद्धिप्रत्ययसाक्षिणं ये विवेकिनो विदुर्विजानन्ति त आत्मविद-क्योंकि ब्रह्म विरज और निष्कल है इसलिये वह शुभ्र यानी शुद्ध और ज्योतियों—अग्नि आदि सम्पूर्ण प्रकाशमय पदार्थोंका भी ज्योतिः—प्रकाशक है । तात्पर्य यह है कि अग्नि आदिका ज्योतिर्मयत्व भी अपने अन्तर्वर्ती ब्रह्मात्मचैतन्यरूप ज्योतिके ही कारण है । जो किसी अन्यसे प्रकाशित न होनेवाला आत्मज्योति है वही परम ज्योति है, जिसे कि आत्मवेत्ता—जो विवेकी पुरुष आत्मा अर्थात् अपनेको शब्दादि विषय और बुद्धिप्रत्ययोंका साक्षी जानते हैं