भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 134 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88

७८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २


स्तद्विदुरात्मप्रत्ययानुसारिणः । यस्मात्परं ज्योतिस्तस्मात्त एव तद्विदुर्नेतरे बाह्यार्थप्रत्ययानुसारिणः ॥ ९ ॥ | वे आत्मानुभवका अनुसरण करनेवाले आत्मज्ञानी पुरुष जानते हैं। क्योंकि वह परम ज्योति है इसलिये उसे वे ही जानते हैं; दूसरे बाह्य प्रतीतियोंका अनुसरण करनेवाले पुरुष नहीं जानते ॥ ९ ॥


कथं तज्ज्योतिषां ज्योतिरित्युच्यते— | वह ज्योतियोंका ज्योति किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है—

ब्रह्मका सर्वप्रकाशकत्व

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १० ॥

वहाँ (उस आत्मस्वरूप ब्रह्ममें) न सूर्य प्रकाशित होता है और न चन्द्रमा या तारे। वहाँ यह बिजली भी नहीं चमकती फिर यह अग्नि किस गिनतीमें है ? उसके प्रकाशित होनेसे ही सब प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसीके प्रकाशसे प्रकाशमान है ॥ १० ॥

न तत्र तस्मिन्स्वात्मभूते ब्रह्मणि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो भाति । तद्ब्रह्म न प्रकाशयति इत्यर्थः । स हि तस्यैव भासा सर्वमन्यदनात्मजातं प्रकाशयति | वहाँ—अपने आत्मस्वरूप ब्रह्ममें सबको प्रकाशित करनेवाला सूर्य भी प्रकाशित नहीं होता अर्थात् वह भी उस ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता । वह (सूर्य) तो उस (ब्रह्म) के प्रकाशसे ही अन्य सब अनात्मपदार्थोंको