भारतकोश
मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ७९
इत्यर्थः । न तु तस्य स्वतः प्रकाशनसामर्थ्यम् । तथा न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निरस्मद्गोचरः ।<br><br>किं बहुना; यदिदं जगद्भाति तत्तमेव परमेश्वरं स्वतः भारूपत्वाद्भान्तं दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते । यथा जलोल्मुकाद्यग्निसंयोगादग्निं दहन्तमनुदहति न स्वतःस्तद्वत्तस्यैव भासा दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि जगद्विभाति ।<br><br>यत एवं तदेव ब्रह्म भाति च विभाति च कार्यगतेन विविधेन भासातस्तस्य ब्रह्मणो भारूपत्वं स्वतोऽवगम्यते । न हि स्वतोऽविद्यमानं भासनमन्यस्य कर्तुंप्रकाशित करता है, उसमें स्वतः प्रकाश करनेका सामर्थ्य है ही नहीं। इसी प्रकार वहाँ न तो चन्द्रमा या तारे ही प्रकाशित होते हैं और न यह बिजली ही; फिर हमें साक्षात् दिखलायी देनेवाला यह अग्नि तो हो ही कैसे सकता है ?<br><br>अधिक क्या ? यह जो जगत् भासता है वह स्वयं प्रकाशरूप होनेके कारण उस परमेश्वरके प्रकाशित होनेपर उसीके पीछे प्रकाशित—देदीप्यमान हो रहा है। जिस प्रकार अग्निके संयोगसे जल और उल्मुक (अंगारा) आदि अग्निके प्रज्वलित होनेपर उसके कारण जलाने लगते हैं—स्वतः नहीं जलाते उसी प्रकार यह सूर्य आदि सम्पूर्ण जगत् उस (परब्रह्म) के प्रकाश—तेजसे ही प्रकाशित होता है।<br><br>क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये वह ब्रह्म ही कार्यगत विचित्र प्रकाशसे विशेषरूपसे प्रकाशित हो रहा है। इससे उस ब्रह्मकी प्रकाशरूपता स्वतः ज्ञात हो जाती है। जिसमें स्वयं प्रकाश नहीं है वह दूसरेको भी प्रकाशित नहीं