नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) बृहत्कथा मञ्जरी में उद्धृत हुई। जीमूतवाहन की कथा इन दोनों ग्रन्थों में दो बार मिलती है— पहिली बार संक्षेप में और दूसरी बार विस्तार से । प्रस्तुत नाटक की कथावस्तु इस संक्षिप्त रूप से अधिक मिलती है । यहां कहीं कुछ भेद अवश्य हैं, यथा, तृतीय अङ्क पूर्णतया हमारे नाटककार की अपनी कल्पना है । जीमूतवाहन एक विद्याधर राजकुमार है । उसके पिता महाराज जीमूतकेतु राजकार्य छोड़ कर वन में शान्त जीवन व्यतीत करने आते हैं, तो स्वयं जीमूतवाहन भी, राज्य का भार मन्त्रियों को सौंप, माता- पिता की सेवा करने के लिए वन में ही आ रहता है । पिता के कहने पर जीमूतवाहन अपने साथी विदूषक के साथ उनके निवासार्थ कोई और अच्छा स्थान खोजने के लिए मलय पर्वत पर आता है । यहां किसी वीणा की गुञ्जार उनके कानों में पड़ती है । यह ध्वनि गौरी के मन्दिर की ओर से आ रही होती है । दोनो मन्दिर की ओर बढ़ते हैं । क्या देखते हैं कि एक सुन्दर सिद्ध कन्या वीणा बजा रही है और उस की सखी पास बैठी है । वीणा वादन के पश्चात् वह कन्या अपनी सहेली को बताती है कि देवी गौरी ने मुझे स्वप्न में दर्शन देकर वर दिया है कि तेरा पति विद्याधर सम्राट् होगा । चतुर विदूषक नायक को बलात् मन्दिर में ले जाकर वहां दोनो का परस्पर साक्षात्कार कराता है । एक दूसरे को देखते ही दोनों को परस्पर प्रेम हो जाता है। परन्तु दोनो प्रेमी भीरु हैं और हैं लज्जाशील । ज्यों त्यों करके परस्पर प्रेम प्रकट करते ही हैं कि आश्रम से एक तपस्वी आता है और नायिका को लेकर चला जाता है । दूसरे अङ्क में नायिका मलयवती प्रेम-विह्वल दिखाई गई है । वह चन्दनलता गृह में एक शिलामञ्च पर बैठी है । तभी राजा (जीमूतवाहन) प्रवेश करता है । वह भी उतना ही व्याकुल है । वह