नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविदूषक से कहता है कि मैं स्वप्न में अपनी प्रिया को इस चन्दनलतागृह में मिला हूँ । अतः आओ इधर ही चलें । उनके आने का शब्द सुन कर दोनों कन्याएँ उठ कर चली जाती हैं और एक अशोक वृक्ष के पीछे जा छुपती हैं । नायक विदूषक को अपने स्वप्न की वार्ता सुनाता है और नायिका सुन रही है । नायक अपनी प्रिया का चित्र बनाता है । वहीं मित्रावसु आता है और अपनी बहिन के साथ विवाह का प्रस्ताव रखता है । परन्तु जीमूतवाहन इसे स्वीकार नहीं करता । उसे नहीं मालूम कि जिसे वह प्यार करता है वही मित्रावसु की बहिन है और अज्ञानवश उसी का हाथ वह ठुकरा रहा है । मित्रावसु चला जाता है । मलयवती, जो छुपे छुपे यह सब देख और सुन रही है, निराशा से इस अपमान को न सह सकती हुई आत्महत्या का निश्चय करती है । मित्रावसु को देखने के बहाने वह अपनी चेटी को भेज देती है । परन्तु चेटी भांप जाती है और जाने की बजाए समीप ही छुप जाती है। अपने आप को अकेली जानकर मलयवती अपने गले में फन्दा डालती है, परन्तु चेटी उसे रोक लेती है और सहायता के लिए पुकारती है । जीमूतवाहन वहीं पहुँचता है और अपना बनाया चित्र दिखा कर उसे विश्वास दिलाता है कि वह उसी से प्रेम करता है । तभी दासी आकर सूचना देती है कि जीमूतवाहन के पिता ने यह सम्बन्ध स्वीकार कर लिया है और क्योंकि विवाह आज ही होना निश्चित हुआ है अतः राजकुमारी को शीघ्र बुलाया है । तीसरे अंक में विवाहोत्सव का वर्णन है । इस अंक का विष्कम्भक अत्यन्त हास्यप्रद है । मक्खियों से बचने के लिए विदूषक विवाह में प्राप्त वस्त्र ओढ़े हुए है । परन्तु विट ग़लती से उसे इस वेश में अपनी प्यारी नवमालिका समझता हैं । और उस से आलिङ्गन करता है । तभी नवमालिका आ जाती है और हँसी मज़ाक बढ़ जाता है ।