भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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( १० ) विष्कम्भक के पश्चात् हम प्रेमियों को बगीचे में प्रसन्नता पूर्वक घूमते देखते हैं । यहां बड़ी सजीव वार्तालाप मिलती है । नायक कई सुन्दर पद्यों में अपनी नवोढा प्रियतमा की सुन्दरता का वर्णन करता है । फिर 'वर्ण' शब्द पर श्लेष मिलता है:— “श्रुतं त्वया भर्तृदारिकां कथं वर्णयति ?” “अद्य पुनरहं त्वां वर्णयामि ।” परन्तु वर्णन करने के स्थान चेटी विदूषक के मुख को तमाल के पत्तों के रस से काला कर देती है । यहीं मित्रावसु द्वारा जीमूतवाहन को समाचार मिलता है कि उस का राज्य मतङ्ग ने हस्तगत कर लिया है । परन्तु वह इस से ज़रा विचलित नहीं होता । उदासीनता की बजाए उस के मुख पर पूर्ववत् प्रसन्नता ही दिखाई देती है । मित्रावसु उसकी अनुमति मांगता है कि सिद्ध सेना ले जाकर वह उसके शत्रु को परास्त करके उस का राज्य लौटा लाए, परन्तु जीमूतवाहन यह कह कर उसे रोक देता है कि — “स्वशरीरमपि परार्थे यः खलु दद्यादयाचितः कृपया राज्यस्य कृते स कथं प्राणिवधक्रौर्यमनुमन्ये ।” अन्तिम दो अङ्क कथावस्तु को सर्वथा बदल देते हैं । प्रेम का स्थान त्याग ले लेता है । एक दिन मित्रावसु के साथ समुद्र के किनारे भ्रमण करते करते जीमूतवाहन को हड्डियों का एक ढेर दृष्टिगोचर होता है । पूछने पर उसे पता लगता है कि यह उन साँपों की हड्डियां हैं जो प्रतिदिन गरुड को आहारार्थ भेंट दिये जाते हैं । यह सुनकर वह निश्चय करता है कि मैं अपना जीवन दान करके भी इन सांपों की रक्षा करूँगा । इसी समय एक सन्देशवाहक मित्रावसु को बुला ले जाता है और जीमूतवाहन अकेला रह जाता है । किसी का करुण रोदन उसके